मैं तो समझा था इक तू ही समझता है मुझे लेकिन
बता अब तू नहीं समझा तो मुझको कौन समझेगा
तेरे दिल की इक ये बस्ती पहले उस इक राजा की थी
जिसने तेरे नाम पर जंगें भी बे-अंदाज़ा की थी
क्या हुआ जो आपने रातों की नींदें मार डाली
हमने भी राहत व नुसरत सुनके यादें ताज़ा की थी
पैसा-दौलत कमा कर, मरना ही है इक दिन तो
थोड़ा कुछ नाम कमा कर के ही घर जाएँगे
वो एक ही शख़्स यार है
वो एक ही से है बंदगी
वो एक ही शख़्स ग़ैर है
वो एक ही शख़्स ज़िन्दगी