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किसी भी ख़ानमाँ-बर्बाद से नहीं होगा
हमारा इश्क़ तो फ़रहाद से नहीं होगा
हमारा इश्क़ तो फ़रहाद से नहीं होगा
तुम्हारी दाद या बे-दाद से नहीं होगा
हमारा शे'र है इमदाद से नहीं होगा
ये लफ़्ज़ियात ये बंदिश ये फ़िक्र फ़रसाई
ये काम वो है जो नक़्क़ाद से नहीं होगा
यूँ खींचता हूँ ग़ज़ल में तिरे बदन के ख़ुतूत
ये जान-ए-मन किसी बहज़ाद से नहीं होगा
अगर हुआ भी रिहाई का गर कोई इम्कान
हुज़ूर मिन्नत-ओ-फ़रियाद से नहीं होगा
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कितने आज़ार मुक़द्दर से लगे रहते हैं
तेरे बीमार तो बिस्तर से लगे रहते हैं
तेरे बीमार तो बिस्तर से लगे रहते हैं
कभी तुझ बाला-नशीं को भी ख़बर पहुँचेगी
कितने सर हैं जो तिरे दर से लगे रहते हैं
शाम होती है तो काम और भी बढ़ जाता है
अन-गिनत यादों के दफ़्तर से लगे रहते हैं
तेरी फ़ुर्क़त में किसे जादा-ओ-मंज़िल का दिमाग़
ग़म के मारे किसी पत्थर से लगे रहते हैं
हम भुला देंगे ज़माने का चलन भी लेकिन
शीशा-ए-दिल पे जो पत्थर से लगे रहते हैं
आज भी कूचा-ए-जानाँ की वही रौनक़ है
अब भी कुछ लोग बराबर से लगे रहते हैं
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दर्द के सामने दौलत नहीं देखी जाती
जंग में सिर्फ़ ग़नीमत नहीं देखी जाती
जंग में सिर्फ़ ग़नीमत नहीं देखी जाती
सर में सौदा हो तो फ़ुर्सत नहीं देखी जाती
दिल के कामों में सुहूलत नहीं देखी जाती
नक़्द-ए-जाँ बेच दी हम ने तिरे वा'दे के एवज़
माल अच्छा हो तो क़ीमत नहीं देखी जाती
सोचना मत कभी अंजाम सर-ए-राह-ए-तलब
दामन-ए-तेग़ पे क़िस्मत नहीं देखी जाती
हम से चुप रहने की बिल-फ़र्ज़ ख़ता हो भी जाए
दामन-ए-हर्फ़ पे तोहमत नहीं देखी जाती
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दिल को कितना समझाया है सब माया है
कौन किसी का हो पाया है सब माया है
कौन किसी का हो पाया है सब माया है
जब भी ख़्वाब से बाहर आने की कोशिश की
नींद का आलम गहराया है सब माया है
हम ने अपनी ख़ातिर इक सूली बनवा कर
ख़ुद को उस पर लटकाया है सब माया है
क्या मज़हर की निस्बत होती है मंज़र से
क्या सूरज है क्या साया है सब माया है
राह में बैठने वाले लोगों ने ही अक्सर
हम को राह से भटकाया है सब माया है
हम ने ज़ीस्त-मुअ'म्मा आख़िर हल कर डाला
सब माया है सब माया है सब माया है
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