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Yahya Khan Yusuf Zai

Top 10 of Yahya Khan Yusuf Zai

Yahya Khan Yusuf Zai

Top 10 of Yahya Khan Yusuf Zai

    बनी-आदम
    तुम्हें कुछ याद भी है
    जब तुम्हें रौशन निशानी दी गई थी

    घमंडी तीरगी को
    जब गुफाओं में जला कर
    मर्ग़-ज़ारों को बहारों से सजाया जा रहा था

    तुम अपने साथ इक रौशन निशानी
    और गुफाओं की विरासत ले के आए थे
    तुम्हारे साथ थोड़े साँप भी थे
    जिन्हों ने अपने विर्से को
    गुफाओं से महकते मर्ग़-ज़ारों तक
    ज़मीनों से समुंदर तक
    हवाओं से ख़लाओं तक सँभाला है

    तुम्हें मालूम है क्या
    तुम्हारे पास तो बस एक इज़्न-ए-रौशनी है
    और उन के पास है इक सरमदी नुस्ख़ा
    गुफाओं की विरासत का

    तुम्हारी सब मता-ए-दीन-ओ-दानिश
    अक़्ल-ओ-आज़ादी का विर्सा
    उन के विर्से के मुक़ाबिल कुछ नहीं कुछ भी नहीं

    और जो तुम्हारे पास है
    वो भी उन्हीं की दस्तरस में है
    तुम्हारा कुछ नहीं कुछ भी नहीं

    तुम्हारी सब मता-ए-बे-बहा
    फिर से गुफाओं की अमानत हो गई है
    और वो साँप उस के पहरे-दार
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    वो चली गई
    वो चटाख़ चिड़िया चली गई
    मिरे आशियाँ में गुज़शता शब वो रुकी
    मगर दम-ए-सुब्ह फिर से वो उड़ गई
    उसे उड़ते रहना पसंद था सो चली गई

    बड़ी शोख़ थी बड़ी तेज़-रौ
    बड़ा चहचहाती थी मुस्कुराती थी
    उस के पंखों में कोई दाम-ए-विसाल था

    मुझे उस का नाम पता नहीं
    वो कहाँ से आई नहीं ख़बर
    वो यहीं कहीं पे छुपी हुई तो नहीं यहीं
    किसी और आँख को दाम-ए-हुस्न में बाँध कर
    दिल-ए-मुब्तला को असीर-ए-वस्ल किए हुए
    वो नहीं गई वो यहीं कहीं तो ज़रूर है
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    कोई सरमाया कब रहा महफ़ूज़
    इक फ़क़ीरी का रास्ता महफ़ूज़

    गोशा-ए-दिल है आलम-ए-हैरत
    बड़ा मा'मूर है बड़ा महफ़ूज़

    दश्त फिर क्यूँ नहीं रहे आबाद
    अब्र आज़ाद है हवा महफ़ूज़

    कश्मकश में है ताइर-ए-फ़िरदौस
    ज़मीं आबाद और ख़ला महफ़ूज़

    जो हवा की पनाह में आए
    वही रह जाएगा दिया महफ़ूज़
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    किसी भी ख़ानमाँ-बर्बाद से नहीं होगा
    हमारा इश्क़ तो फ़रहाद से नहीं होगा

    तुम्हारी दाद या बे-दाद से नहीं होगा
    हमारा शे'र है इमदाद से नहीं होगा

    ये लफ़्ज़ियात ये बंदिश ये फ़िक्र फ़रसाई
    ये काम वो है जो नक़्क़ाद से नहीं होगा

    यूँ खींचता हूँ ग़ज़ल में तिरे बदन के ख़ुतूत
    ये जान-ए-मन किसी बहज़ाद से नहीं होगा

    अगर हुआ भी रिहाई का गर कोई इम्कान
    हुज़ूर मिन्नत-ओ-फ़रियाद से नहीं होगा
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    कितने आज़ार मुक़द्दर से लगे रहते हैं
    तेरे बीमार तो बिस्तर से लगे रहते हैं

    कभी तुझ बाला-नशीं को भी ख़बर पहुँचेगी
    कितने सर हैं जो तिरे दर से लगे रहते हैं

    शाम होती है तो काम और भी बढ़ जाता है
    अन-गिनत यादों के दफ़्तर से लगे रहते हैं

    तेरी फ़ुर्क़त में किसे जादा-ओ-मंज़िल का दिमाग़
    ग़म के मारे किसी पत्थर से लगे रहते हैं

    हम भुला देंगे ज़माने का चलन भी लेकिन
    शीशा-ए-दिल पे जो पत्थर से लगे रहते हैं

    आज भी कूचा-ए-जानाँ की वही रौनक़ है
    अब भी कुछ लोग बराबर से लगे रहते हैं
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    दर्द के सामने दौलत नहीं देखी जाती
    जंग में सिर्फ़ ग़नीमत नहीं देखी जाती

    सर में सौदा हो तो फ़ुर्सत नहीं देखी जाती
    दिल के कामों में सुहूलत नहीं देखी जाती

    नक़्द-ए-जाँ बेच दी हम ने तिरे वा'दे के एवज़
    माल अच्छा हो तो क़ीमत नहीं देखी जाती

    सोचना मत कभी अंजाम सर-ए-राह-ए-तलब
    दामन-ए-तेग़ पे क़िस्मत नहीं देखी जाती

    हम से चुप रहने की बिल-फ़र्ज़ ख़ता हो भी जाए
    दामन-ए-हर्फ़ पे तोहमत नहीं देखी जाती
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    तिरी यादों के चराग़ों में ये जलती हुई रात
    मिरी आँखों से छलकती रही ढलती हुई रात

    सम-ए-इमरोज़ से मारा हुआ हारा हुआ दिन
    किसी फ़र्दा की उमीदों पे बहलती हुई रात

    कभी आँखों में रुके कोई गुज़रता हुआ पल
    कभी साँसों में अटक जाती है चलती हुई रात

    न टला है कभी ज़ख़्मों में सुलगता हुआ दिन
    न थमी है कभी अश्कों में उबलती हुई रात

    मिरे हाथों की लकीरों में मशक़्क़त दिन की
    मिरे ख़्वाबों के मुक़द्दर में है ढलती हुई रात
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    तेरी साँसों का ज़ेर-ओ-बम जानम
    तोड़ दे सब्र का भरम जानम

    ये बदन कोई पुर-ख़तर रस्ता
    फ़ित्ना-सामाँ है ख़म-ब-ख़म जानम

    ऐसी नाज़ुक कमर कि जुलते हैं
    बहती नदियों के पेच-ओ-ख़म जानम

    तुम ने बस मुस्कुरा के देख लिया
    लड़खड़ाने लगे क़दम जानम

    इतनी मुद्दत के बा'द मिलती हो
    हाल पूछोगी कम से कम जानम
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    उस के शोख़ लबों की लाली डस लेगी
    नागन जैसी आँखों वाली डस लेगी

    उस के ज़हर-ए-निगाह में कोई मस्ती है
    लगता है वो चश्म-ए-ग़ज़ाली डस लेगी

    शहज़ादी का जिस्म ख़ज़ाने जैसा है
    पहरे-दारों को रखवाली डस लेगी

    दिन भर तो ऑफ़िस में बक बक करता हूँ
    शाम को फिर तन्हाई साली डस लेगी

    कौन किसी का बोझ यहाँ पर सहता है
    आख़िर फूलों को भी डाली डस लेगी
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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    दिल को कितना समझाया है सब माया है
    कौन किसी का हो पाया है सब माया है

    जब भी ख़्वाब से बाहर आने की कोशिश की
    नींद का आलम गहराया है सब माया है

    हम ने अपनी ख़ातिर इक सूली बनवा कर
    ख़ुद को उस पर लटकाया है सब माया है

    क्या मज़हर की निस्बत होती है मंज़र से
    क्या सूरज है क्या साया है सब माया है

    राह में बैठने वाले लोगों ने ही अक्सर
    हम को राह से भटकाया है सब माया है

    हम ने ज़ीस्त-मुअ'म्मा आख़िर हल कर डाला
    सब माया है सब माया है सब माया है
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    Yahya Khan Yusuf Zai
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