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खींच लाई थी मुझे ख़ुश्बू ही तेरे पैरहन की
पर तिरी आँखों में है वहशत भी आहू-ए-ख़ुतन की
पर तिरी आँखों में है वहशत भी आहू-ए-ख़ुतन की
इश्क़ की आतिश कहाँ बारूद के शो'ले हैं रक़्साँ
अब कहाँ वो ज़ुल्फ़ और वो दास्ताँ दार-ओ-रसन की
क्या हुए वो दिन कि जब अक्सर मुयस्सर थी मुझे भी
दिन को ज़ुल्मत ज़ुल्फ़ की और धूप शब को सीम-तन की
आतिश-ए-फ़ुर्क़त से मैं शब को उजाला माँगता हूँ इश्क़ में होती नहीं है हद कोई दीवाने-पन की
रौशनी जिस की मिरी आँखों को ख़ीरा कर चुकी है
राख कर के छोड़ देगी अब हरारत इस बदन की
देख के रस्ते के मंज़र सब के सब थे ग़र्क़-ए-हैरत
याद ऐसे में भला आती किसे अपने वतन की
Read Fullअब कहाँ वो ज़ुल्फ़ और वो दास्ताँ दार-ओ-रसन की
क्या हुए वो दिन कि जब अक्सर मुयस्सर थी मुझे भी
दिन को ज़ुल्मत ज़ुल्फ़ की और धूप शब को सीम-तन की
आतिश-ए-फ़ुर्क़त से मैं शब को उजाला माँगता हूँ इश्क़ में होती नहीं है हद कोई दीवाने-पन की
रौशनी जिस की मिरी आँखों को ख़ीरा कर चुकी है
राख कर के छोड़ देगी अब हरारत इस बदन की
देख के रस्ते के मंज़र सब के सब थे ग़र्क़-ए-हैरत
याद ऐसे में भला आती किसे अपने वतन की
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ऐ हवा-ए-दयार-ए-दर्द-ओ-मलाल
मर्हबा मर्हबा तआल तआल
मर्हबा मर्हबा तआल तआल
लफ़्ज़ गुम-सुम हैं और इन में है ग़म
मेरी ख़ामोशियों का जाह-ओ-जलाल
अक़्ल से कस्ब-ए-रौशनी कर के
मुल्क-ए-दिल हो गया है रू-ब-ज़वाल
तू भी उस में है तेरी दुनिया भी
कितना गहरा है सोच का पाताल
पक्की सड़कों पे याद आता है
कच्चे रस्तों का सब्ज़ा-ए-पामाल
किस पे अब है चिनार का साया
ईं जीरानिना-ओ-कैफ़ल-हाल
खोल दीवान-ए-हाफ़िज़-ए-शीराज़
फ़ाल तू अब रफ़ीक़-ए-राज़ निकाल
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दयार-ए-जिस्म से सहरा-ए-जाँ तक
उड़ूँ मैं ख़ाक सा आख़िर कहाँ तक
उड़ूँ मैं ख़ाक सा आख़िर कहाँ तक
कुछ ऐसा हम को करना चाहिए अब
उतर आए ज़मीं पर आसमाँ तक
बहुत कम फ़ासला अब रह गया है
बिफरती आँधियों से बादबाँ तक
मुयस्सर आग है गुल की न बिजली
अंधेरे में पड़े हैं आशियाँ तक
ये जंगल है निहायत ही पुर-असरार
क़दम रखती नहीं इस में ख़िज़ाँ तक
वहीं तक क्यूँ रसाई है हमारी
नुक़ूश-ए-पा ज़मीं पर हैं जहाँ तक
निकल आओ हिसार-ए-ख़ामुशी से
जो दिल में है वो लाओ भी ज़बाँ तक
यहाँ शैताँ प है इक लर्ज़ा तारी
नहीं उठता चराग़ों से धुआँ तक
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चाँदनी रात में इक बार उसे देखा था
चाँद से बर-सर-ए-पैकार उसे देखा था
चाँद से बर-सर-ए-पैकार उसे देखा था
मिस्ल-ए-ख़ुर्शीद नुमूदार वो अब तक न हुआ
आख़िरी बार सर-ए-ग़ार उसे देखा था
मैं भला कैसे बयाँ करता सरापा उस का
शब-ए-यलदा पस-ए-दीवार उसे देखा था
दिल में उतरी ही न थी रौशनी उस मंज़र की
अव्वलीं बार तो बेकार उसे देखा था
लोग क्यूँ कोह ओ बयाबाँ में उसे ढूँडते हैं
मैं ने तो बर-सर-ए-बाज़ार उसे देखा था
उस ने क्या रात को देखा था ये मालूम नहीं
मैं ने तो नक़्श-ब-दीवार उसे देखा था
उस की आँखों में चमक ख़्वाब की ये कैसी है
रात भर चर्ख़ ने बेदार उसे देखा था
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