ला के दुनिया में हमें ज़हर-ए-फ़ना देते हैं
हाए इस भूल-भुलय्याँ में दग़ा देते हैं
हाए इस भूल-भुलय्याँ में दग़ा देते हैं
रहम भी ज़ुल्म-ओ-सितम से नहीं ख़ाली उन का
दामन-ए-तेग़ से ज़ख़्मों को हवा देते हैं
दिल में दर्द आँखों में आशोब-ए-जिगर में सोज़िश इश्क़ क्या देते हैं इक रोग लगा देते हैं
मुनइमों का नहीं दरयूज़ा-गरों पर एहसाँ
आप क्या देंगे वो ख़ालिक़ का दिया देते हैं
दहन-ए-यार की ता'रीफ़ लिखी क्या कहना
'क़द्र' तो झूट को सच कर के दिखा देते हैं
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जो दाग़ है इश्क़-ए-दिल-नशीं का जो दिल-नशीं हैं दिल-ए-हज़ीं का
वही है तमग़ा मिरी जबीं का वही सुलैमाँ मिरे नगीं का
वही है तमग़ा मिरी जबीं का वही सुलैमाँ मिरे नगीं का
गई न मर कर भी कीना-ख़्वाही मिला के मिट्टी में की तबाही
मिरी तरह से कहीं इलाही फ़लक भी पैवंद हो ज़मीं का
तड़प न पूछो दिल-ए-हज़ीं की कहूँ मैं तुम से कहाँ कहाँ की
उसी से है गर्दिश आसमाँ की उसी से है ज़लज़ला ज़मीं का
जहान सर पर उठा रहा हूँ जुनूँ में धू
में मचा रहा हूँ
जो दश्त में ख़ाक उड़ा रहा हूँ दिमाग़ गुर्दों पे है ज़मीं का
करम में हम को ग़ज़ब में हम को किया जो मुम्ताज़ सब में हम को
तुम्हारी दुश्नाम-ओ-लब में हम को मज़ा मिला ज़हर-ओ-अंग्बीं का
ये लाग़री अब है ख़ार-ए-दामन कि उठ नहीं सकता बार-ए-दामन
जो पाँव अपना है तार-ए-दामन तो हाथ है तार आस्तीं का
मियान-ए-महशर मलालतों से मैं शम्अ'' हूँ दिल की हालतों से
कि पाँव तक सौ ख़िजालतों से अरक़ बहा है मिरी जबीं का
सुख़न को 'क़द्र' औज दे ज़बाँ से कि तुख़्म-ए-अफ़्शाँ हो ला-मकाँ से
किया है 'नासिख़' ने आसमाँ से बुलंद-तर रुत्बा इस ज़मीं का
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शब-ए-ग़म में छाई घटा काली काली
झुकी है बला पर बला काली काली
झुकी है बला पर बला काली काली
बहुत ऐसे काले हिरन हम ने देखे
दिखाते हैं आँखें वो क्या काली काली
डटे मिल के रिंद-ए-सियह-मस्त जिस दम
झुकी मय-कदे पर घटा काली काली
शब-ए-माह में वो फिरे बाल खोले
हुई चाँदनी जा-ब-जा काली काली
ये सज्दे को ख़ुद झुक पड़ेगी चमन पर
कि क़िबले से उट्ठी घटा काली काली
खुली सब पर आख़िर तिरी गर्म-दस्ती
हुई खोलते ही हिना का काली काली
लुंढा दे मय-ए-सुर्ख़ तू अब तो साक़ी
घटा उट्ठी है देख क्या काली काली
मिरे का'बा-ए-दिल के मिटने का ग़म है
जो ओढ़े है का'बा सबा काली काली
हुए हैं सियह-बख़्त बर्बाद लाखों
उठीं आँधियाँ बारहा काली काली
बुख़ारात दिल-ए-आह पर छा गए हैं
घटा है बरु-ए-हवा काली काली
मैं देखूँगा मुँह उन का दे कर ये फ़िक़रा
तिरी शक्ल है मह-लक़ा काली काली
सियह नामा-ए-'क़द्र' महशर में निकला
उठी धूप में इक घटा काली काली
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बड़े नाज़ों से दिल में जल्वा-ए-जानाना आता है
ये घर जिस ने बनाया है वो वो साहब-ख़ाना आता है
ये घर जिस ने बनाया है वो वो साहब-ख़ाना आता है
ख़ुदा के वास्ते मुँह से लगा दे ख़ुम के ख़ुम साक़ी
बड़ा घनघोर बादल जानिब-ए-मय-ख़ाना आता है
निकल जाता है मुँह से नाम उन का बातों बातों में
ज़बाँ पर जो न आना था वो बेताबाना आता है
निकलती है किसी पर झूम कर वो मुझ पे गिरती है
तुम्हारी तेग़ को क्या शेवा-ए-मस्ताना आता है
बहार आख़िर हुई है 'क़द्र' की तुर्बत पे मेला है
यहाँ बेड़ी बढ़ाने को हर इक दीवाना आता है
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जो उज़्व-ए-बातिन ख़ुदा बनाता तो हम दिल-ए-बे-क़रार होते
जो उज़्व-ए-ज़ाहिर ख़ुदा बनाता तो दीदा-ए-अश्क-बार होते
जो उज़्व-ए-ज़ाहिर ख़ुदा बनाता तो दीदा-ए-अश्क-बार होते
जो गर्द कर के ख़ुदा उड़ाता तो उड़ते गर्द-ए-मलाल हो कर
जो संग कर के ख़ुदा जमाता तो जम के लौह-ए-मज़ार होते
ख़ुदा जो शाना हमें बनाता तो हम ख़लिश होते अपने दिल की
ख़ुदा जो आईना हम को करता तो अपने हैरान-कार होते
जो रोज़ हम को ख़ुदा बनाता तो बनते रोज़-ए-फ़िराक़-ए-जानाँ
जो रात हम को ख़ुदा बनाता तो हम शब-ए-इंतिज़ार होते
ग़रज़ कि ऐसा मुसीबतों का हमारे दिल को मज़ा पड़ा है
कि 'क़द्र' हम को ख़ुदा बनाता तो हो के बे-क़द्र ख़्वार होते
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