रह-ए-सफ़र में रहे और हयात से गुज़रे
कि एक रंग में कितने जिहात से गुज़रे
कि एक रंग में कितने जिहात से गुज़रे
बड़े सुकून से हम एहतियात से गुज़रे
क़दम जमा के चले काएनात से गुज़रे
है कोई अज़्म-ए-जवाँ और न कुछ जुनूँ-ख़ेज़ी
बे-दस्त-ओ-पा ही रहे मुम्किनात से गुज़रे
यक़ीन दिल में रहा तेरी दिलरुबाई का
सो जाग जाग के हम सारी रात से गुज़रे
कोई नतीजा कहाँ बात का निकल पाया
कि एक बात ही क्या बात बात से गुज़रे
तग़य्युरात की दुनिया में हम रहे हर दम
कि सोते जागते हम भी हयात से गुज़रे
कभी न ख़ुद को किया वक़्फ़-ए-इंहिमाक-ए-वजूद
'उबैद' बच के रहे हादसात से गुज़रे
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पुर-कैफ़ कहीं के भी नज़ारे न रहेंगे
दुनिया में अगर इश्क़ के मारे न रहेंगे
दुनिया में अगर इश्क़ के मारे न रहेंगे
दुनिया-ए-मोहब्बत में चराग़ाँ न मिलेगा
पलकों पे अगर अश्क हमारे न रहेंगे
तुम छोड़ के मत जाओ मुझे शहर-ए-बला में
वर्ना मिरे जीने के सहारे न रहेंगे
तय कर लो सफ़र शब का कि मौक़ा है ग़नीमत
फिर चर्ख़-ए-बरीं पे ये सितारे न रहेंगे
ग़म ज़ीस्त के अफ़्साने का उनवान हसीं है
हम होंगे कहाँ ग़म जो हमारे न रहेंगे
बे-म'अनी नज़र आएँगे आँखों के सहीफ़े
मौजूद अगर उन में इशारे न रहेंगे
फिर किस पे यक़ीं कैसा भरम कैसी मुरव्वत
आज़ा भी हमारे जो हमारे न रहेंगे
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मसअले मेरे सभी हल कर दे
वर्ना यारब मुझे पागल कर दे
वर्ना यारब मुझे पागल कर दे
वक़्त की धूप में जलता है बदन
मुझ पे साया कोई आँचल कर दे
ऐसी तहज़ीब से हासिल क्या है
जो भरे शहर को जंगल कर दे
रोक रक्खी है घटा आँखों में
वर्ना बह जाए तो जल-थल कर दे
वो जो रखता है मुझे नज़रों में
कहीं नज़रों से न ओझल कर दे
शहर में जादू है जाने कैसा
ज़र-ए-ख़ालिस को जो पीतल कर दे
ग़म है सौग़ात की सूरत यारब
तू मिरे ग़म को मुसलसल कर दे
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