दिल पे कुछ और गुज़रती है मगर क्या कीजे
लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं
लफ़्ज़ कुछ और ही इज़हार किए जाते हैं
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कब कौन कहाँ किस लिए ज़ंजीर-बपा है
ये उक़्द-ए-असरार-ए-अज़ल किस पे खुला है
ये उक़्द-ए-असरार-ए-अज़ल किस पे खुला है
किस भेस कोई मौज-ए-हवा साथ लगा ले
किस देस निकल जाए ये दिल किस को पता है
इक हाथ की दूरी पे हैं सब चाँद सितारे
ये अर्श-ए-जाँ किस दम-ए-दीगर की अता है
आहंग-ए-शब-ओ-रोज़ के नैरंग से आगे
दिल एक गुल-ए-ख़्वाब की ख़ुश्बू में बसा है
ये शहर-ए-तिलिस्मात है कुछ कह नहीं सकते
पहलू में खड़ा शख़्स फ़रिश्ता कि बला है
हर सोच है इक गुम्बद-ए-एहसास में गर्दां
और गुम्बद-ए-एहसास में दर हर्फ़-ए-दुआ है
ये दीद तो रूदाद-ए-हिजाबात है 'आली'
वो माह-ए-मुकम्मल न घटा है न बढ़ा है
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उसे दिल से भुला देना ज़रूरी हो गया है
ये झगड़ा ही मिटा देना ज़रूरी हो गया है
ये झगड़ा ही मिटा देना ज़रूरी हो गया है
लहू बरफ़ाब कर देगी थकन यकसानियत की
सो कुछ फ़ित्ने जगा देना ज़रूरी हो गया है
गिरा दे घर की दीवारें न शोरीदा-सरी में
हवा को रास्ता देना ज़रूरी हो गया है
बहुत शब के हवा-ख़्वाहों को अब खुलने लगे हैं
दियों की लौ घटा देना ज़रूरी हो गया है
भरम जाए कि जाए राह पर आए न आए
उसे सब कुछ बता देना ज़रूरी हो गया है
मैं कहता हूँ कि जाँ हाज़िर किए देता हूँ लेकिन
वो कहते हैं अना देना ज़रूरी हो गया है
ये सर शानों पे अब इक बोझ की सूरत है 'आली'
सर-ए-मक़्तल सदा देना ज़रूरी हो गया है
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रास्ता सोचते रहने से किधर बनता है
सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
सर में सौदा हो तो दीवार में दर बनता है
आग ही आग हो सीने में तो क्या फूल झड़ें
शो'ला होती है ज़बाँ लफ़्ज़ शरर बनता है
ज़िंदगी सोच अज़ाबों में गुज़ारी है मियाँ
एक दिन में कहाँ अंदाज़-ए-नज़र बनता है
मुद्दई तख़्त के आते हैं चले जाते हैं
शहर का ताज कोई ख़ाक-बसर बनता है
इश्क़ की राह के मेआ'र अलग होते हैं
इक जुदा ज़ाइच-ए-नफ़-ओ-ज़रर बनता है
अपना इज़हार असीर-ए-रविश-ए-आम नहीं
जैसे कह दें वही मेयार-ए-हुनर बनता है
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दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
बे-ताबी कुछ और बढ़ा दी एक झलक दिखला देने से
प्यास बुझे कैसे सहरा की दो बूँदें बरसा देने से
हँसती आँखें लहू रुलाएँ खिलते गुल चेहरे मुरझाएँ
क्या पाएँ बे-महर हवाएँ दिल धागे उलझा देने से
हम कि जिन्हें तारे बोने थे हम कि जिन्हें सूरज थे उगाने
आस लिए बैठे हैं सहर की जलते दिए बुझा देने से
आली शे'र हो या अफ़्साना या चाहत का ताना बाना
लुत्फ़ अधूरा रह जाता है पूरी बात बता देने से
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दिल आबाद कहाँ रह पाए उस की याद भुला देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
कमरा वीराँ हो जाता है इक तस्वीर हटा देने से
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