था उन की तरह मैं भी आग़ाज़ में सौदाई
बढ़ने दो जुनूँ याराँ आ जाएगी दानाई
बढ़ने दो जुनूँ याराँ आ जाएगी दानाई
फिर दिल का तक़ाज़ा है उस शोख़ से कुछ कहिए
फिर कोह-ए-तमन्ना पर इक बर्क़ सी लहराई
आईन-ए-ज़बाँ-बंदी जिस अहद में नाफ़िज़ हो
इस अहद में ख़ामोशी हो जाए है गोयाई
जब आग लगी घर में था कौन बुझाने को
अब तक तो मिला हम को हर शख़्स तमाशाई
हुश्यारी में ग़फ़लत सी ग़फ़लत में भी हुश्यारी
है तेरे क़लंदर में इक शान-ए-शकेबाई
ख़ामोश खड़ा था मैं सब क़त्ल के दरपय थे
जब ग़ौर से देखा तो उन में था मिरा भाई
दिन-भर तो शिकारे में घू
में हैं जनाब-ए-शैख़
कहते हैं धरा क्या है हर-सम्त ब-जुज़ काई
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दिल जो मुर्दा हो तो ये रश्क-ए-जिनाँ कुछ भी नहीं
लाला हो सब्ज़ा हो या आब-ए-रवाँ कुछ भी नहीं
लाला हो सब्ज़ा हो या आब-ए-रवाँ कुछ भी नहीं
ये दहकते हुए ग़ुंचे ये सुलगते हुए दिल
हर तरफ़ सोज़-ए-दरूँ हर्फ़-ए-ज़बाँ कुछ भी नहीं
प्यारे दामन से जुदा हो गए मैं ने देखा
हसरतें बोलीं मियाँ उम्र-ए-रवाँ कुछ भी नहीं
लफ़्ज़-ओ-मा'नी में जो रिश्ता है वो बुनियादी है
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का इक सैल-ए-रवाँ कुछ भी नहीं
कर्दा-ना-कर्दा गुनाहों में कटी उम्र-ए-अज़ीज़
लोग कहते हैं ज़ियाँ वर्ना ज़ियाँ कुछ भी नहीं
बारिश-ए-संग हो शीशे की कमीं-गाहों से
कैसे फ़रज़ाने हो शीशे का मकाँ कुछ भी नहीं
ख़्वाब से ख़्वाब में इक उम्र गिरफ़्तार रहा
अब खला ख़्वाब ब-जुज़ वहम-ओ-गुमाँ कुछ भी नहीं
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नश्तर सी दिल में चुभती हुई बात ले चलें
आए हैं तो ख़ुलूस की सौग़ात ले चलें
आए हैं तो ख़ुलूस की सौग़ात ले चलें
वीरानियों के घर में मिरा दम ही घुट न जाए
आ ऐ ख़याल-ए-यार तुझे साथ ले चलें
जब रौशनी थी चलता था साया भी साथ साथ
अब है अँधेरी रात किसे साथ ले चलें
जिस में उमीद-ओ-यास फ़रेब-ए-नज़र रही
इस हफ़्त-ख़्वान-ए-ग़म की रिवायात ले चलें
शम-ए-उमीद जिस में फ़रोज़ाँ न हो सकी
अब उस की बज़्म-ए-नाज़ में वो रात ले चलें
कुछ बेकसों के घर जले कुछ बे-दयार हैं
उन के हुज़ूर अश्कों की बरसात ले चलें
रंग-ए-शफ़क़ में ख़ून-ए-शहीदाँ है जल्वा-गर
अपने अज़ीम मुल्क की सौग़ात ले चलें
अपने नगर में बस यही किर्चें हैं हर तरफ़
कुछ गौहर-ए-तलाफ़ी-ए-माफ़ात ले चलें
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वादा-ए-उलफ़त-ओ-पैमान-ए-वफ़ा से तौबा
तजरबा कहता है उस हुस्न-ए-अदास तौबा
तजरबा कहता है उस हुस्न-ए-अदास तौबा
रात तारीक है बेचैनी बढ़ी जाती है
जिस का उल्टा हो असर ऐसी दुआ से तौबा
अपना घर बन गया मक़्तल मगर हम अहल-ए-यकीं
नहीं करते हैं ग़म-ए-होश-रुबास तौबा
उन की फ़सताई तबीअ'त में है क़त्ल-ओ-ग़ारत
क्यूँ करेंगे वो भला ज़ुल्म-ओ-जफ़ा से तौबा
बिजली चमके तो बहाने से लिपट जाते हैं
फिर वो कहते हैं बड़ी शर्म-ओ-हया से तौबा
चश्म-ए-साक़ी की क़सम था ये बहाना वर्ना
कहीं करते हैं मय-ओ-जाम के प्यासे तौबा
उस ने तो चीर दिया अहल-ए-चमन के दिल को
अब के बल खाई हुई बाद-ए-सबास तौबा
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