Taufique Habib
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जब तलब है बहिश्त की तो फिर
दिल की इस्लाह क्यूँ नहीं करता
दिल की इस्लाह क्यूँ नहीं करता
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ये फ़सादात का ज़माना है
दिल हिदायात पर लगाना है
दिल हिदायात पर लगाना है
हो ख़सारा अगर मुझे इस
में
तो बहाना नहीं बनाना है
फिर ख़यालात पर नहीं क़ाबू
इस क़दर रात शाइराना है
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