दिल लिया है तो ख़ुदा के लिए कह दो साहब
मुस्कुराते हो तुम्हीं पर मिरा शक जाता है
मुस्कुराते हो तुम्हीं पर मिरा शक जाता है
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है आठ पहर तू जल्वा-नुमा तिमसाल-ए-नज़र है परतव-ए-रुख़
आरिज़ है क़मर ख़ुर्शीद जबीं शब-ए-ज़ुल्फ़-ए-सहर है परतव-ए-रुख़
आरिज़ है क़मर ख़ुर्शीद जबीं शब-ए-ज़ुल्फ़-ए-सहर है परतव-ए-रुख़
आँखों में हुआ है घर तेरा दिल कहता है रख हर दम पर्दा
हो चश्म-ए-तमन्ना क्यूँ कर वा आशिक़ की नज़र है परतव-ए-रुख़
जब मद्द-ए-नज़र अग़्यार थे वाँ तारीक था याँ आँखों में जहाँ
रौशन है चराग़-ए-रूह-ए-रवाँ क्या आज इधर है परतव-ए-रुख़
की फ़िक्र मगर बाइस न खुला ऐ लाला-रुख़-ए-बे-मेहर-ओ-वफ़ा
बतला तो ये दिल का दर्द है क्या गर दाग़-ए-जिगर है परतव-ए-रुख़
ग़श कोई किसी को है सकता है नूर-ए-ख़ुदा तेरा जल्वा
हो दख़्ल तिरे घर में किस का याँ हाजिब-ए-दर है परतव-ए-रुख़
उठ आशिक़-ए-मुज़्तर सज्दे कर आई है शब-ए-मक़्सद की सहर
वो देखते हैं ग़ुर्फ़े से इधर ऐ ख़ाक-बसर है परतव-ए-रुख़
शोहरा है बहार-ए-आरिज़ का बुलबुल की तरह आशिक़ हैं फ़िदा
है बाग़-ए-जवानी रूह-अफ़्ज़ा बर्ग-ए-गुल-ए-तर है परतव-ए-रुख़
जिस से हो आँसू ख़ून-ए-जिगर बन जाए अक़ीक़-ओ-ल'अल-ओ-गुहर
ख़ुर्शीद-ओ-क़मर और सीम-ओ-ज़र ऐ जान मगर है परतव-ए-रुख़
बेताब 'हबीब'-ए-मुज़्तर है हैरान कभी गह शश्दर है
फिरता है गुल-ए-ख़ुर्शीद-सिफ़त मुँह उस का जिधर है परतव-ए-रुख़
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हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है
ठहर ऐ अजल कि वो आएँगे दम-ए-वापसीं का क़रार है
ठहर ऐ अजल कि वो आएँगे दम-ए-वापसीं का क़रार है
रहें महव क्यूँ न हर एक दम कि नज़र में जल्वा-ए-यार है
दिल-ए-मुंतज़िर है जो आइना तो ख़याल आइना-दार है
ये ख़ता-ए-इश्क़ की दी सज़ा कि मिज़ा से मर्दुम-ए-चश्म ने
मिरा दिल दिखा के ये कह दिया इसे लो ये क़ाबिल-ए-दार है
ये ख़ुदा ही जाने वो कौन था जो शहीद-ए-नाज़-ओ-अदा हुआ
कि उड़ी है ख़ाक-ए-रह-ए-सनम तो ख़िज़ाँ में रंग-ए-बहार है
हुईं तर्क सारी मोहब्बतें मिरे सर पे ढाई हैं आफ़तें
यही दिल के लेने में शर्त थी यही मुझ से क़ौल-ओ-क़रार है
ये जुनूँ की देखिए पुख़्तगी जो कभी किसी ने न हो सुनी
मिरे पैरहन का जो तार है वो हर एक रेशा-ए-ख़ार है
कोई दिल की निकली न आरज़ू हुआ रंज-ओ-ग़म से जिगर लहू
फिरे ख़ाक छानते कू-ब-कू न तो सब्र है न क़रार है
पस-ए-मर्ग भी हैं वही सितम हैं जफ़ाएँ रूह पे दम-ब-दम
इधर आते आते वो फिर गए जो सुना कि मेरा मज़ार है
मिरे सीने को न हदफ़ करो तपिश-ए-जिगर से डरे रहो
पर-ए-मुर्ग़-ए-तीर न जल उठें कि लहू ब-रंग-ए-शरार है
वो ख़ुशी दिखाई न चर्ख़ ने कि एवज़ में जिस के न ग़म दिए
कभी फ़र्श-ए-गुल है जो एक शब तो महीनों बिस्तर-ए-ख़ार है
जिसे दर्द-ए-नाला-ओ-आह है जो शहीद-ए-तेग़-ए-निगाह है
शब-ए-हिज्र उस की गवाह है वो 'हबीब'-ए-सीना-फ़िगार है
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है नौ-जवानी में ज़ोफ़-ए-पीरी बदन में रअशा कमर में ख़म है
ज़मीं पे साया है अपने क़द का कि जादा-ए-मंज़िल-ए-अदम है
ज़मीं पे साया है अपने क़द का कि जादा-ए-मंज़िल-ए-अदम है
यही है रस्म-ए-जहान-ए-फ़ानी इसी में कटती है ज़िंदगानी
कभी है सामान-ए-ऐश-ओ-राहत कभी हुजूम-ए-ग़म-ओ-अलम है
बताओ क्यूँ चुप हो मुँह से बोलो गुहर-फ़िशाँ हो दहन तो खोलो
अज़ीज़ रखते हो जिस को दिल से उसी के सर की तुम्हें क़सम है
हटाओ आईने को ख़ुदारा लबों पे आया है दम हमारा
बनाव तुम देखते हो अपना यहाँ है धड़का कि रात कम है
तुम्हारे कूचे में जब से बैठे भुलाए दिल से सभी तरीक़े
ख़ुदा ही शाहिद जो जानते हों कहाँ कलीसा कहाँ हरम है
अबस है कोशिश हुसूल-ए-ज़र में ख़याल-ए-फ़ासिद को रख न सर में
वही मिलेगा अज़ल से जो कुछ हर एक के नाम पर रक़म है
फ़रिश्ते जन्नत को ले चले थे प तेरे कूचे में हम जो पहुँचे
मचल गए उन से कह के छोड़ो हमें यही गुलशन-ए-इरम है
जुदा हो जब यार अपना साक़ी कहाँ की सोहबत शराब कैसी
पिलाएँ गर ख़िज़्र आब-ए-हैवाँ हम उस को समझें यही कि सम है
जिलाए या हम को कोई मारे बहिश्त दे या सक़र में डाले
रहेगा उस बुत का नाम लब पर हमारे जब तक कि दम में दम है
'हबीब' ता-चंद फ़िक्र-ए-दौलत कभी तो कर दिल से शुक्र-ए-नेअमत
करीम को है करम की आदत मगर ये ग़फ़लत तिरी सितम है
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गुलों का दौर है बुलबुल मज़े बहार में लूट
ख़िज़ाँ मचाएगी आते ही इस दयार में लूट
ख़िज़ाँ मचाएगी आते ही इस दयार में लूट
कुशूद-ए-कार की कोशिश में दे न हिर्स को दख़्ल
शिकस्त देती है फ़ौजों को कार-ज़ार में लूट
लुभाए सैकड़ों दिल उन के ख़ाल-ए-आरिज़ ने
मचाए ज़ंगियों ने वादी-ए-ततार में लूट
वो मुन्तज़िम है रहे जिस की जुज़-ओ-कुल पे नज़र
न कर सके कोई गूँगीर कारोबार में लूट
जहाँ में होती है एहसान की जज़ा एहसान
सवाब नेकियों के दौर-ए-इख़्तियार में लूट
अबस है बूँद का चूका अगर घड़े ढलकाए
हमेशा नक़्द में वारा है याँ उधार में लूट
किए हैं शेब ने सब जिस्म के क़वा कमज़ोर
शुरूअ हो गई हर सम्त इस हिसार में लूट
हुजूम-ए-यास में छोड़ ऐ उम्मीद किश्वर-ए-दिल
है क़त्ल-ए-आम का ग़ुल शहर में जवार में लूट
बने वो फ़ातेह-ए-कौनैन ख़ुश हो तू जिस से
ज़्यादा गंज-ए-कवाकिब से हो शुमार में लूट
दयार-ए-दिल में है फिर दाग़-ए-इश्क़ का तोड़ा
जुनूँ मता-ए-हवस मौसम-ए-बहार में लूट
भरी है ताज़ा हर एक सर में शोर-ओ-शर की हवा
अजब नहीं जो मचे बाग़-ए-रोज़गार में लूट
'हबीब' मश्क़-ए-रियाज़त से खो के ज़ंग-ए-दुई
मज़े विसाल के हर दम फ़िराक़-ए-यार में लूट
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