ये हिकमत-ए-अमली है कोई कीना नहीं है
इस हिज्र के घाव को अभी सीना नहीं है
इस हिज्र के घाव को अभी सीना नहीं है
अब सामने बनता है मिरा अक्स तमाशा
ये हर्ज़ा-सराई पस-ए-आईना नहीं है
कुछ दिन की शनासाई शनासाई न समझो
ये ख़ुद से तअ'ल्लुक़ मिरा देरीना नहीं है
अहकाम यहाँ दिल के ही चलते हैं कम-ओ-बेश
ये इश्क़ है इस की कोई काबीना नहीं है
बनते हैं हवाओं में तमन्ना के घरौंदे
ये वो हैं मकाँ जिन में कोई ज़ीना नहीं है
मरता तो कोई शख़्स नहीं हिज्र में फिर भी
ये जीना मिरे दोस्त कोई जीना नहीं है
हैं दर्ज सभी दिल पे मोहब्बत के ख़सारे
ये गिन के लिखे हैं कोई तख़्मीना नहीं है
10
0 Likes
इश्क़ जो वालिहाना होता है
ख़ुद को ही आज़माना होता है
ख़ुद को ही आज़माना होता है
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ ही नहीं होते
शे'र पूरा ज़माना होता है
कश्तियाँ और लोग लाते हैं
मैं ने दरिया बनाना होता है
मुब्तला बे निशाँ नहीं होते
उन का अपना घराना होता है
लोग करते हैं इश्क़ की बातें
मैं ने कर के दिखाना होता है
वस्ल तन्हा नहीं है उस के जनाब
हिज्र शाना-ब-शाना होता है
हम किसी को पयाम देते हैं
शे'र तो इक बहाना होता है
मैं मिज़ाजन फ़क़ीर हूँ मेरा
हर सुख़न आजिज़ाना होता है
9
0 Likes
8
0 Likes
अदब से आरी दरिंदा-सिफ़ात लोगों में
मैं बैठता ही नहीं वाहियात लोगों में
मैं बैठता ही नहीं वाहियात लोगों में
नहीं तवील मिरे आश्नाओं की फ़िहरिस्त
मैं जाना जाता हूँ बस पाँच सात लोगों में
ख़ुदा का शुक्र सुख़न राएगाँ नहीं मेरा
सुनी गई है मिरी बात बात लोगों में
मुझे भी छोड़ के जाना है एक रोज़ जहाँ
मिरा शुमार भी है बे-सबात लोगों में
मुझे ख़ुदा पे मुकम्मल यक़ीन है मिरे दोस्त
मैं ढूँढ़ता नहीं राह-ए-नजात लोगों में
ये इश्क़ मैं ने छुपा कर किया था सो इस की
बयान कैसे करूँ मुश्किलात लोगों में
ये क्या बना हूँ मोहब्बत का मैं शजर साहिब
बिखर गया है मिरा पात पात लोगों में
7
0 Likes
हो के बारीक मिल रही है मुझे
हर ख़बर वीक मिल रही है मुझे
हर ख़बर वीक मिल रही है मुझे
ख़ुश बहुत हैं हम एक दूसरे से
ज़िंदगी ठीक मिल रही है मुझे
फूल है इश्क़ का सुहूलत-कार
इस से तहरीक मिल रही है मुझे
मुतमइन हूँ के साहबो हर चीज़
घर के नज़दीक मिल रही है मुझे
मह-वशों को दुआएँ देता हूँ
हुस्न की भीक मिल रही है मुझे
मैं तयक़्क़ुन की खोज में था मियाँ
और तश्कीक मिल रही है मुझे
6
0 Likes
5
0 Likes
कहते हैं जिस को इश्क़ मिरे भाई जंग है
ये दो दिलों के बीच इलाक़ाई जंग है
ये दो दिलों के बीच इलाक़ाई जंग है
तन्हाई से इलाक़ा है मुझ को मिरे अज़ीज़
मेरे लिए ये अंजुमन-आराई जंग है
जो लड़ रहा हूँ मिल के मोहब्बत के साथ मैं
ये जंग भी मियाँ मिरी आबाई जंग है
सोचों का इख़्तिलाफ़ है ये और कुछ नहीं
सो पेश-रफ़्त और न पस्पाई जंग है
मैं ख़ुद से कर रहा हूँ सो मुझ को बताइए
ज़ेरीं है साहबो कि ये बालाई जंग है
हम इश्क़ के महाज़ पे हैं साहिबान-ए-शौक़
कीजे हमारी हौसला-अफ़ज़ाई जंग है
4
0 Likes
ज़माने की सताई ख़ुद-कुशी है
मोहब्बत इब्तिदाई ख़ुद-कुशी है
मोहब्बत इब्तिदाई ख़ुद-कुशी है
जहाँ सफ़्फ़ाक आँखें घात में हों
वहाँ चेहरा-नुमाई ख़ुद-कुशी है
मैं राय इश्क़ पर अब और क्या दूँ
कहा तो है कि भाई ख़ुद-कुशी है
मैं उस को फूल दे कर ख़ुश नहीं हूँ
कि ये भी दिल-रुबाई ख़ुद-कुशी है
ये इस्ति'माल करने पर खुला है
कि ख़ुशबू कीमयाई ख़ुद-कुशी है
शिकारी घात में बैठा हो तो फिर
परिंदे की रिहाई ख़ुद-कुशी है
किसी तितली का मर जाना अज़ीज़ो
हक़ीक़त में निसाई ख़ुद-कुशी है
3
0 Likes
2
0 Likes
बहती हुई आँखों की रवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं
कुछ ख़्वाब मिरे ऐन-जवानी में मरे हैं
रोता हूँ मैं उन लफ़्ज़ों की क़ब्रों पे कई बार
जो लफ़्ज़ मिरी शोला-बयानी में मरे हैं
कुछ तुझ से ये दूरी भी मुझे मार गई है
कुछ जज़्बे मिरे नक़्ल-ए-मकानी में मरे हैं
क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरे हैं
इस इश्क़ ने आख़िर हमें बर्बाद किया है
हम लोग इसी खौलते पानी में मरे हैं
कुछ हद से ज़ियादा था हमें शौक़-ए-मोहब्बत
और हम ही मोहब्बत की गिरानी में मरे हैं
1
0 Likes









