0
  • Search
  • Shayari
  • Writers
  • Events
  • Blog
  • Store
  • Leaderboard
  • Login
0
HomeExplore
Submit
LibraryProfile
Ehtisham ul Haq Siddiqui

Top 10 of Ehtisham ul Haq Siddiqui

Ehtisham ul Haq Siddiqui

Top 10 of Ehtisham ul Haq Siddiqui

    अपने शब-यारों से किस तरह मैं ग़ाफ़िल हो जाऊँ
    आसमाँ जाग रहा है तो मैं कैसे सो जाऊँ

    दिल-ब-दर मैं भी हूँ और तू भी है मा'ज़ूल-नज़र
    तू इजाज़त दे अगर मुझ को मैं तेरा हो जाऊँ

    वक़्त ने इतने बदलवाए हैं चेहरे मुझ से
    ख़ौफ़ है भीड़ में इन की न किसी दिन खो जाऊँ

    जहल की बाँझ ज़मीनों में न अग पाऊँगा
    इल्म-परवर हो ज़मीं कोई तो ख़ुद को बो जाऊँ

    अब्र-ए-ग़म दिल का बरस जाए तो इस पानी से
    दाग़ धब्बे हैं जो आँखों में उन्हें भी धो जाऊँ
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    10
    0 Likes
    और अब अक़्ल का बार नहीं गर सह सकते हो
    दिल के इस पागल-ख़ाने में रह सकते हो

    मेरे दिल में रहना रास नहीं आया तो
    बे-शक आँख से आँसू बन कर बह सकते हो

    तुम सर-ता-पा आग हो मैं हूँ टोटल पानी
    साफ़ है मेरे साथ नहीं तुम रह सकते हो

    पत्थर-वत्थर ज़ालिम-वालिम बेहिस-वेहस
    मुझ को जो भी कहना चाहो कह सकते हो

    मिट्टी होता तो पी जाता पर शीशा हूँ
    मेरे ऊपर बे-फ़िक्री से बह सकते हो
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    9
    0 Likes
    किस ने की बात अभी कौन शनासा निकला
    याद आया तो मिरा अपना ही चेहरा निकला

    गर्मी-ए-ज़ीस्त नहीं आज मुक़द्दर में मिरे
    आज सूरज भी जो निकला तो अधूरा निकला

    लौट जाने में लगेंगे मुझे बरसों शायद
    ये समुंदर तो मिरी सोच से गहरा निकला

    जिस्म तो ले गया वो रात में चोरी कर के
    सुब्ह बिस्तर से मिरे जिस्म का ख़ाका निकला

    ज़हमत-ए-नुत्क़ से यूँ बच गए दोनों आख़िर
    मैं ही गूँगा न था वो शख़्स भी बहरा निकला
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    8
    0 Likes
    सौ तक गिनती बीस पहाड़े काम आए
    सारी दौलत में ये सिक्के काम आए

    इतने चेहरे जेब में रखे फिरते थे
    वक़्त पड़े पर कितने चेहरे काम आए

    तेरी अय्याशी थी मेरी मजबूरी
    तू ने कपड़े फेंके मेरे काम आए

    जिन को छत पर डाल दिया था गर्मी में
    सर्दी में वो धूप के टुकड़े काम आए

    आँखों ने ही इस को पाला पोसा है
    शर्म के कब ये चिलमन पर्दे काम आए

    छालों के पानी से आख़िर प्यास बुझी
    जंगल में जंगल के तोहफ़े काम आए
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    7
    0 Likes
    कोई ताज़ा हो कि हो कोई पुरानी चाहिए
    वक़्त को आगे बढ़ाना है कहानी चाहिए

    तू मिरी दहलीज़ पर आ कर ठहर जाता है क्यूँ
    तू तो दरिया है तुझे तो बस रवानी चाहिए

    हाथ में जिस के भी देखो आग का कश्कोल है
    और हर इक कश्कोल को कुछ बूँद पानी चाहिए

    ज़िंदगी और मौत दोनों में है इक रंग-ए-करम
    तुम बताओ तुम को किस की मेहरबानी चाहिए

    दिल से मतलब है तिरे पैकर से मुझ को क्या ग़रज़
    हुक्मरानी को मुझे इक राजधानी चाहिए
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    6
    0 Likes
    नसीब अब के ख़ुशी बे-हिसाब ले आया
    चराग़ लेने गया आफ़्ताब ले आया

    अभी जला के उठा हूँ पुराने ख़्वाबों को
    वो मेरे वास्ते फिर ताज़ा ख़्वाब ले आया

    फिर आज भाव समुंदर का आसमान पे था
    फिर आज अपने लिए मैं सराब ले आया

    फ़सुर्दा देख के उस को बहुत पशेमाँ हूँ
    मैं रेगज़ार में क्यूँ इक गुलाब ले आया

    तुझे तो हाँ या नहीं में जवाब देना था
    जवाब में तू मुकम्मल किताब ले आया

    अभी चला ही था दिल इक गुनाह करने को
    कि ज़ेहन जा के ख़याल-ए-अज़ाब ले आया
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    5
    0 Likes
    वो जो रो रहा था वो हँस पड़ा वो जो हँस रहा था वो रो दिया
    यहाँ इक जज़ीरा बना दिया वहाँ इक जज़ीरा डुबो दिया

    ये बनाने वाले का शौक़ है कहीं हार है कहीं तौक़ है
    कहीं वाह है कहीं आह है कहीं पा लिया कहीं खो दिया

    वो असीर-ए-हुस्न-ए-बयान हूँ मैं ज़बान का वो किसान हूँ
    कि ज़मीन मुझ को जहाँ दिखी वहीं इक ख़याल को बो दिया

    वो जहान-ए-हस्त के मोतियों को पिरो रहा था कमाल में
    मैं भी सामने था पड़ा हुआ तो मुझे भी उस ने पिरो दिया

    न तिलिस्म है न ये सहर है ये कमाल-ए-कूज़ा-ए-शेर है
    कि उसी से बहर रवाँ किया और उसी में बहर समो दिया
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    4
    0 Likes
    तिरे बदन की नज़ाकतों का हुआ है जब हम-रिकाब मौसम
    नज़र नज़र में खिला गया है शरारतों के गुलाब मौसम

    हम अपने गुम-गश्ता वलवलों पर ख़ुनुक हवाओं के क़हक़हों का
    जवाब देते जो साथ लाता हमारा अहद-ए-शबाब मौसम

    वो एक बंजर ज़मीन घर की जो सुन रही थी सभी के ता'ने
    ख़ुशा कि इस बार इस ज़मीं को भी दे गया इक गुलाब मौसम

    अमीर लोगों की कोठियों तक तिरे ग़ज़ब की पहुँच कहाँ है
    फ़क़त ग़रीबों के झोंपड़ों तक है तेरा दस्त-ए-इताब मौसम

    ये बर्फ़ पिघलेगी चोटियों से परों में आएगी फिर हरारत
    भरेंगे ऊँची उड़ान फिर हम रहेगा कब तक ख़राब मौसम
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    3
    0 Likes
    शुक्रिया बीच सफ़र आप ने तन्हा छोड़ा
    इस तरह आप ने मुझ से मिरा रिश्ता जोड़ा

    शिद्दत-ए-तैश से काँप उट्ठी हैं सारी शाख़ें
    जब भी गुलचीं ने किसी शाख़ से गुल को तोड़ा

    अपने अंदर से वो इक दम न निकालेगा मुझे
    मुझ को आँखों से वो टपकाएगा थोड़ा थोड़ा

    हम ने तहज़ीब से मयख़ाने का बदला है निज़ाम
    हम ने मय फेंकी न मयख़ाने में साग़र तोड़ा

    दोनों ख़ुश हैं तो अब इस बात का क्या ज़िक्र करें
    किस ने रुख़ अपना दर-ए-यार से पहले मोड़ा
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    2
    0 Likes
    ये दुनिया है यहाँ असली कहानी पुश्त पर रखना
    लबों पर प्यास रखना और पानी पुश्त पर रखना

    तमन्नाओं के अंधे शहर में जब माँगने निकलो
    तो चादर सब्र की सदियों पुरानी पुश्त पर रखना

    मैं इक मज़दूर हूँ रोटी की ख़ातिर बोझ उठाता हूँ
    मिरी क़िस्मत है बार-ए-हुक्मरानी पुश्त पर रखना

    तुझे भी इस कहानी में कहीं खोना है शहज़ादे
    ख़ुदा हाफ़िज़ ये मोहर-ए-ख़ानदानी पुश्त पर रखना

    हमेशा वक़्त का दरिया इसे रफ़्तार बख़्शेगा
    जिसे आता हो दरिया की रवानी पुश्त पर रखना
    Read Full
    Ehtisham ul Haq Siddiqui
    1
    0 Likes
Bashir BadrBashir BadrAsrar Ul Haq MajazAsrar Ul Haq MajazShaheen AbbasShaheen AbbasGagan Bajad 'Aafat'Gagan Bajad 'Aafat'Alam KhursheedAlam KhursheedAli Sardar JafriAli Sardar JafriTehzeeb HafiTehzeeb HafiKaif Ahmad SiddiquiKaif Ahmad SiddiquiShahzad AhmadShahzad AhmadEhsan DanishEhsan Danish