10
0 Likes
9
0 Likes
बुलंद फ़िक्र की हर शे'र से अयाँ हो रमक़
मिरे क़लम से अदा हो कभी ग़ज़ल का हक़
मिरे क़लम से अदा हो कभी ग़ज़ल का हक़
उदास उदास हैं इंसाँ हर एक चेहरा फ़क़
ये शहर शहर है या दश्त है ये लक़-ओ-दक़
मैं दिल की बात कहूँ यूँ कि दिल तलक पहुँचे
न हों किनाए ही मुबहम न इस्तिआ'रे अदक़
चलो समेट के ऑफ़िस को अपने घर की तरफ़
उफ़ुक़ के पार वो देखो उतर रही है शफ़क़
ज़रा सा इल्म-ओ-हुनर पा गए तो कुछ कम-ज़र्फ़
समझ रहे हैं सभी को ही अहक़र-ओ-अहमक़
फिर एहतिजाज के रस्ते पे क्यूँ चलेंगे हम
हमें जो मिलता रहे आप से हमारा हक़
तअ'ल्लुक़ात में क़ाएम रखें भरोसे को
कि शक हमेशा ही करता रहा है रिश्ते शक़
किसी किताब में मिलता नहीं है ज़िक्र 'आज़म'
हमें सिखाए हैं इस ज़िंदगी ने ऐसे सबक़
8
0 Likes
7
0 Likes
6
0 Likes
हर शख़्स में कुछ लोग कमी ढूँड रहे हैं
नादान हैं मुसबत में नफ़ी ढूँड रहे हैं
नादान हैं मुसबत में नफ़ी ढूँड रहे हैं
गुल ढूँड रहे हैं न कली ढूँड रहे हैं
गुलशन में बस इक शाख़ हरी ढूँड रहे हैं
इस युग में कहाँ हम भी वली ढूँड रहे हैं
इंसाँ में सिफ़ात-ए-बशरी ढूँड रहे हैं
बादल की सियाही में किरन जैसी चमकती
हर ग़म में छिपी हम भी ख़ुशी ढूँड रहे हैं
इक शे'र जो मौज़ूँ नहीं कर पाए हैं अब तक
'ग़ालिब' की ग़ज़ल में भी कमी ढूँड रहे हैं
मुद्दत से तक़ाज़ा है कि लौटा दो मिरा दिल
मुद्दत से बहाना है अभी ढूँड रहे हैं
तहज़ीब-ओ-तमद्दुन को ख़ुलूस और वफ़ा को
'आज़म' ही नहीं आज सभी ढूँड रहे हैं
5
0 Likes
अश्क पर ज़ोर कुछ चला ही नहीं
मैं ने रोका बहुत रुका ही नहीं
मैं ने रोका बहुत रुका ही नहीं
आतिश ज़ेर-ए-पा सबब वर्ना
ख़ाक सहरा की छानता ही नहीं
या तो सब का ख़ुदा ही सच्चा है
या तो सच्चा कोई ख़ुदा ही नहीं
ज़ेहन कहता है सर झुका ले तू
दिल मगर है कि मानता ही नहीं
बाल-ओ-पर हों क़वी तो क्या हासिल
जब उड़ानों का हौसला ही नहीं
हाए मैं ने पस-ए-ग़लत-फ़हमी
वो सुना मैं ने जो कहा ही नहीं
मौत का डर इसे दिखाएँ क्या
ज़िंदा रहना जो चाहता ही नहीं
सिर्फ़ एहसास-ए-कमतरी है तुझे
और तू है कि मानता ही नहीं
मैं ही मैं बज़्म में रहा मौजूद
और मैं बज़्म में गया ही नहीं
मेरी ग़ीबत में वो भी हैं शामिल
आज तक जिन से मैं मिला ही नहीं
जो कि पहचान हो मिरी 'आज़म'
शे'र ऐसा कोई हुआ ही नहीं
4
0 Likes
3
0 Likes
2
0 Likes
बिकेगी उस की ही दस्तार तय है
कि जिस की क़ीमत-ए-किरदार तय है
कि जिस की क़ीमत-ए-किरदार तय है
हुआ था हादिसा कुछ और लेकिन
लिखेगा और कुछ अख़बार तय है
बड़े आँगन पे इतराओ न इतना
उठेगी उस में भी दीवार तय है
है नालायक़ मगर सरदार का है
बनेगा बेटा ही सरदार तय है
है मुंसिफ़ ही गिरफ़्तार-ए-तअ'स्सुब
अदालत में हमारी हार तय है
न ले जा हम को उस महफ़िल में ऐ दिल
जहाँ होना ज़लील-ओ-ख़्वार तय है
हुनर है ऐसे रिश्तों को निभाना
जहाँ हर बात पर तकरार तय है
सदा सच बोलते हो तुम भी 'आज़म'
तुम्हारे वास्ते भी दार तय है
1
0 Likes









