नक़्द-ए-दिल है कि गरेबान के हर तार में है
हौसला अब भी बहुत तेरे ख़रीदार में है
हौसला अब भी बहुत तेरे ख़रीदार में है
याँ कोई शो'ला-ब-जाँ और भी ठहरा होगा
किस क़यामत की तपिश साया-ए-दीवार में है
कितना मिलता है मिरे क़ल्ब की कैफ़िय्यत से
ये जो हंगामा तिरे कूचा-ओ-बाज़ार में है
ज़ख़्म एहसास को जो ज़हर हरा ही रक्खे
तेग़-ए-आहन में नहीं बात की तलवार में है
सारे गुलशन को जलाने के लिए काफ़ी है
एक शो'ला जो दिल मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार में है
ज़ामिन नश्व-ओ-नुमा-ए-गुल-ए-तर है ऐ 'दिल'
दर्द-मंदी की ख़लिश सी जो दिल-ए-ख़ार में है
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फिर मरहला-ए-ख़्वाब-ए-बहाराँ से गुज़र जा
मौसम है सुहाना तो गरेबाँ से गुज़र जा
मौसम है सुहाना तो गरेबाँ से गुज़र जा
शीशे के मकाँ और नज़र के मुतहम्मिल
दीवाना न बन शहर-ए-निगाराँ से गुज़र जा
सब क़त्ल के अस्बाब बहम हैं सर-ए-मक़्तल
ऐसे में पस-ओ-पेश न कर जाँ से गुज़र जा
फिर देंगे वही मशवरा-ए-तर्क-ए-मोहब्बत
अहबाब-नुमा हल्क़ा-ए-याराँ से गुज़र जा
कुछ दूर नहीं मंजिल-ए-मक़्सूद-ए-तमन्ना
इक फासला-ए-क़ुर्ब-ए-रग-ए-जाँ से गुज़र जा
ऐ 'दिल' इन्हें इदराक कहाँ नम्रतियों का
जो कहते हैं पल भर में बयाबाँ से गुज़र जा
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ढंग जीने का न मरने की अदा माँगी थी
हम ने तो जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा माँगी थी
हम ने तो जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा माँगी थी
क्या ख़बर थी कि अँधेरों को भी शर्मा देंगे
जिन उजालों के लिए हम ने दुआ माँगी थी
इश्क़ में राज़-ए-बक़ा क्या है ख़बर थी हम को
हम ने कुछ सोच समझ कर ही फ़ना माँगी थी
माँगने वालों में शामिल तो थे हम भी लेकिन
हम ने उस दर पे फ़क़त तर्ज़-ए-नवा माँगी थी
बन गई हुस्न-ए-तलब भी तो मुअ'म्मा ऐ 'दिल'
दर्द माँगा था वो समझे कि दवा माँगी थी
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कहाँ मैं अभी तक नज़र आ सका हूँ
ख़ुदा जाने कितनी तहों में छुपा हूँ
ख़ुदा जाने कितनी तहों में छुपा हूँ
ये किस ने सदा दी मुझे ज़िंदगी ने
मगर मैं तो सदियाँ हुईं मर चुका हूँ
ये कह कर तो मंज़िल ने दिल तोड़ डाला
जहाँ से चला था वही मरहला हूँ
ये दिलचस्प वअ'दे ये रंगीं दिलासे
अजब साज़िशें हैं कहाँ आ गया हूँ
तिरा क़ुर्ब हासिल हुआ भी तो क्या है
वही फ़ासला था वही फ़ासला हूँ
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रह गया ख़्वाब-ए-दिल-आराम अधूरा किस का
ढल गई शब तो खुला है ये दरीचा किस का
ढल गई शब तो खुला है ये दरीचा किस का
लम्हा लम्हा मुझे वीरान किए देता है
बस गया मेरे तसव्वुर में ये चेहरा किस का
आज़माइश की घड़ी है सर-ए-मक़्तल देखें
ज़ेर-ए-ख़ंजर वही रहता है इरादा किस का
ये जो बेदार भी हैं सोए हुए भी इन में
शाम किस की है ख़ुदा जाने सवेरा किस का
रह-रव-ए-आख़िर-ए-शब हैं सभी उकताए हुए
कौन कब तक है यहाँ साथ भरोसा किस का
मेरे क़ातिल के तजस्सुस में भटकने वालो
ख़ून आलूद है बस्ती में पसीना किस का
आईना-ख़ाना दो-आलम को बना कर ऐ 'दिल'
मुंतज़िर बैठा है वारफ़्ता-ओ-शैदा किस का
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दिल पर रखो निगाह जिगर पर नज़र करो
मक़्दूर हो तो ज़ात में अपनी सफ़र करो
मक़्दूर हो तो ज़ात में अपनी सफ़र करो
हंगाम-ए-ख़ैर-मक़्दम-ए-सुब्ह-ए-नशात है
परवाना-वार शाम से रक़्स-ए-शरर करो
ज़ंजीर तोड़ना भी बड़ा काम था मगर
फ़ुर्सत में हो तो ज़ीनत-ए-दीवार-ओ-दर करो
मायूस-कुन है आलम-ए-इम्काँ अभी तो क्या
दुनिया-ए-मुम्किनात पे अपनी नज़र करो
जो ग़म भी दे हयात ख़ुशी से क़ुबूल हो
इतना तो एहतिमाम ग़म-ए-मो'तबर करो
अपनों को तो निबाहने वाले हज़ार हैं
इंसान हो तो दिल में अदू के भी घर करो
जाता नहीं ये तीर किसी हाल में ख़ता
हर मरहला हयात का उल्फ़त से सर करो
सब लुट रहे हैं बर-सर-ए-बाज़ार इन दिनों
किस से कहें कि क़द्र-ए-मता-ए-हुनर करो
इक रहगुज़ार मंज़िल-ए-मस्ती है मय-कदा
हर रिंद को ख़ुशी से शरीक-ए-सफ़र करो
ऐ 'दिल' बहुत ख़राब हैं हालात शहर के
याँ जिस किसी से बात करो मुख़्तसर करो
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कितने हुए हैं ख़ून यहाँ इक उसूल के
आएँगे अब न शहर-ए-तमन्ना में भूल के
आएँगे अब न शहर-ए-तमन्ना में भूल के
सारी मुसाफ़िरत की थकन दूर हो गई
पेश आए कितने प्यार से काँटे बबूल के
चेहरे हुए जो गर्द तो आईना बन गए
क्या तुर्फ़ा मो'जिज़ात थे सहरा की धूल के
कितना हसीं था जुर्म-ए-ग़म-ए-दिल कि दो-जहाँ
दर पे हैं आज तक मिरे रंग-ए-क़ुबूल के
नाज़ाँ है ज़िंदगी मिरी अब उन की मौत पर
जो लोग रह गए तिरी बाहोँ में झूल के
आने को थी बस आख़िरी हिचकी मरीज़ को
क़ुर्बान जाइए तिरी शान-ए-नुज़ूल के
ऐ 'दिल' ये हाल इश्क़ में होगा ख़बर न थी
पछताए हम तो रोग लगा कर फ़ुज़ूल के
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अदा-ए-हैरत-ए-आईना-गर भी रखते हैं
हमें न छेड़ कि अब तक नज़र भी रखते हैं
हमें न छेड़ कि अब तक नज़र भी रखते हैं
न गिर्द-ओ-पेश से इस दर्जा बे-नियाज़ गुज़र
जो बे-ख़बर से हैं सब की ख़बर भी रखते हैं
कहाँ गया तिरी महफ़िल में ज़ोम-ए-दीद-वराँ
ये हौसला तो यहाँ कम-नज़र भी रखते हैं
क़फ़स को खोल मगर इतना सोच ले सय्याद
बहुत असीर तेरे बाल-ओ-पर भी रखते हैं
फ़रिश्ता है तो तक़द्दुस तुझे मुबारक हो
हम आदमी हैं तो ऐब-ओ-हुनर भी रखते हैं
खुशा-नसीब कि दीवाने हैं तो हम ऐ 'दिल'
कमाल-ए-निस्बत-ए-दीवाना-गर भी रखते हैं
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जाते हुए निगाह इधर कर के देख लो
हम लोग फिर कहाँ हमें जी-भर के देख लो
हम लोग फिर कहाँ हमें जी-भर के देख लो
देता है अब यही दिल-ए-शोरीदा मशवरा
जीने से तंग हो तो मियाँ मर के देख लो
रहने का दश्त में भी सलीक़ा नहीं गया
याँ भी क़रीने सारे मिरे घर के देख लो
शाहान-ए-कज-कुलाह ज़मीं-बोस हो गए
तेवर मगर वही हैं मिरे सर के देख लो
सज्दे में दो-जहान हैं ऐ 'दिल' हमारे साथ
रुत्बे ये आस्तान क़लंदर के देख लो
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