रुख़-ए-हयात है शर्मिंदा-ए-जमाल बहुत
जमी हुई है अभी गर्द-ए-माह-ओ-साल बहुत
जमी हुई है अभी गर्द-ए-माह-ओ-साल बहुत
गुरेज़-पा है जो मुझ से तिरा विसाल तो क्या
मिरा जुनूँ भी है आमादा-ए-ज़वाल बहुत
मुझे हर आन ये देता है वस्ल की लज़्ज़त
वफ़ा-शनास है तुझ से तिरा ख़याल बहुत
किताब-ए-ज़ीस्त के हर इक वरक़ पे रौशन हैं
ये तेरी फ़र्दा-निगाही के ख़द-ओ-ख़ाल बहुत
पलट गए जो परिंदे तो फिर गिला क्या है
हर एक शाख़-ए-शजर पर बिछे हैं जाल बहुत
तुम्हें है नाज़ अगर अपने हुस्न-ए-सरकश पर
तो मेरा इश्क़ भी है रू-कश-ए-जमाल बहुत
अज़ान-ए-सुब्ह की हर लय की तार टूट गए
फ़रोग़-ए-ज़ुल्मत-ए-शब का है ये कमाल बहुत
किसी भी प्यास के मारे की प्यास बुझ न सकी
समुंदरों में तो आते रहे उछाल बहुत
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रुत न बदले तो भी अफ़्सुर्दा शजर लगता है
और मौसम के तग़य्युर से भी डर लगता है
और मौसम के तग़य्युर से भी डर लगता है
दर्द-ए-हिजरत के सताए हुए लोगों को कहीं
साया-ए-दर भी नज़र आए तो घर लगता है
एक साहिल ही था गिर्दाब-शनासा पहले
अब तो हर दिल के सफ़ीने में भँवर लगता है
बज़्म-ए-शाही में वही लोग सर-अफ़राज़ हुए
जिन के काँधों पे हमें मोम का सर लगता है
खा लिया है तो उसे दोस्त उगलते क्यूँ हो
ऐसे पेड़ों पे तो ऐसा ही समर लगता है
अज्नबिय्यत का वो आलम है कि हर आन यहाँ
अपना घर भी हमें अग़्यार का घर लगता है
शब की साज़िश ने उजालों का गला घूँट दिया
ज़ुल्मत-आबाद सा अब नूर-ए-सहर लगता है
मंज़िल-ए-सख़्त से हम यूँ तो निकल आए हैं
और जो बाक़ी है क़यामत का सफ़र लगता है
घर भी वीराना लगे ताज़ा हवाओं के बग़ैर
बाद-ए-ख़ुश-रंग चले दश्त भी घर लगता है
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तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे
जिन का घर नहीं कोई घर के ख़्वाब लिखेंगे
जिन का घर नहीं कोई घर के ख़्वाब लिखेंगे
तुम को क्या ख़बर इस की ज़िंदगी पे क्या बीती
ज़िंदगी के ज़ख़्मों पर हम किताब लिक्खेंगे
जिस हवा ने काटी हैं ख़ामुशी की ज़ंजीरें
उस हवा के लहजे को इंक़लाब लिक्खेंगे
झूट की परस्तिश में उम्र जिन की गुज़री है
तीरगी-ए-शब को वो आफ़्ताब लिक्खेंगे
शे'र की सदाक़त पर हम यक़ीन रखते हैं
मस्लहत के चेहरों को बा-नक़ाब लिक्खेंगे
सूलियों पे झूलेगा बद-निहाद हर मुंसिफ़
मुंसिफ़ी का जब भी हम ख़ुद निसाब लिक्खेंगे
ग़म नहीं जो ख़्वाबों की लुट गई हैं ताबीरें
हम नज़र के ताक़ों में और ख़्वाब लिक्खेंगे
हिर्ज़-ए-जाँ समझते हैं हम वतन की मिट्टी को
अपने घर के ख़ारों को हम गुलाब लिक्खेंगे
इस ग़ज़ल के परतव में बे-घरों की बातें हैं
बे-घरों के नाम इस का इंतिसाब लिक्खेंगे
हर दलील काटेंगे हम दलील-ए-रौशन से
'बख़्श' सौ सवालों का इक जवाब लिक्खेंगे
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समुंदर का तमाशा कर रहा हूँ
मैं साहिल बन के प्यासा मर रहा हूँ
मैं साहिल बन के प्यासा मर रहा हूँ
अगरचे दिल में सहरा-ए-तपिश है
मगर मैं डूबने से डर रहा हूँ
मैं अपने घर की हर शय को जला कर
शबिस्तानों को रौशन कर रहा हूँ
वही लाए मुझे दार-ओ-रसन पर
मैं जिन लोगों का पैग़म्बर रहा हूँ
वही पत्थर लगा है मेरे सर पर
अज़ल से जिस को सज्दे कर रहा हूँ
तराशे शहर मैं ने 'बख़्श' क्या क्या
मगर ख़ुद ता-अबद बे-घर रहा हूँ
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कोई शय दिल को बहलाती नहीं है
परेशानी की रुत जाती नहीं है
परेशानी की रुत जाती नहीं है
हमारे ख़्वाब चोरी हो गए हैं
हमें रातों को नींद आती नहीं है
कोई तितली कमाँ-दारों के डर से
फ़ज़ा में पँख फैलाती नहीं है
हर इक सूरत हमें भाती नहीं है
कोई सूरत हमें भाती नहीं है
जिस आज़ादी के नग़्में हैं ज़बाँ पर
वो आज़ादी नज़र आती नहीं है
बदन बे-हरकत-ओ-बे-हिस पड़े हैं
लहू की बूँद गरमाती नहीं है
मुसलसल पोश की चाबुक-ज़नी से
मिरी आशुफ़्तगी जाती नहीं है
ज़वाल-ए-फ़िक्र-ओ-फ़न की 'बख़्श' तोहमत
जलाल-ए-हर्फ़ पर आती नहीं है
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