जरस-ए-मय ने पुकारा है उठो और सुनो
शैख़ आए हैं सू-ए-मय-कदा लो और सुनो
शैख़ आए हैं सू-ए-मय-कदा लो और सुनो
किस तरह उजड़े सुलगती हुई यादों के दिए
हमदमो दिल के क़रीब आओ रुको और सुनो
ज़ख़्म-ए-हस्ती है कोई ज़ख़्म-ए-मोहब्बत तो नहीं
टीस उट्ठे भी तो फ़रियाद न हो और सुनो
ख़ुद ही हर घाव पे कहते हो ज़बाँ गंग रहे
ख़ुद ही फिर पुर्सिश-ए-अहवाल करो और सुनो
दास्ताँ कहते हैं जलते हुए फूलों के चराग़
अभी कुछ और सुनो दीदा-वरो और सुनो
शहरयारों के हैं हर गाम पे चर्चे 'राहत'
ये वो बस्ती है कि बस कुछ न कहो और सुनो
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किसी मकाँ के दरीचे को वा तो होना था
मुझे किसी न किसी दिन सदा तो होना था
मुझे किसी न किसी दिन सदा तो होना था
जिसे ख़मीदा सरों से मिले क़द-ओ-क़ामत
उसे किसी न किसी दिन ख़ुदा तो होना था
मैं जानता था जबीनों पे बल पड़ेंगे मगर
क़लम का क़र्ज़ था आख़िर अदा तो होना था
ये क्या ज़रूर पता पूछते फिरें उस का
मिला ही यूँ था वो जैसे जुदा तो होना था
वो पिछली रात की ख़ुशबू रची रची सी फ़ज़ा
सहर क़रीब थी वक़्फ़-ए-दुआ तो होना था
हम एक जाँ ही सही दिल तो अपने अपने थे
कहीं कहीं से फ़साना जुदा तो होना था
मैं आइना था छुपाता किसी को क्या राहत
वो देखता मुझे जब भी ख़फ़ा तो होना था
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मैं तिरी दस्तरस से बहुत दूर था
फिर भी नज़दीक आने पे मजबूर था
फिर भी नज़दीक आने पे मजबूर था
आज मैं ही सज़ा-वार-ए-जौर-ओ-सितम
कल तिरी माँग का मैं ही सिंदूर था
कौन आता है यूँ ज़ेर-ए-दाम इन दिनों
रात तारीक थी आशियाँ दूर था
कुछ ख़ुलूस-ए-वफ़ा पर भी नादिम था मैं
और कुछ दिल के ज़ख़्मों से भी चूर था
आइना देख कर यूँ नदामत हुई
मैं कि 'राहत' हूँ अब पहले मंसूर था
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ज़िंदगी एक सज़ा हो जैसे
किसी गुम्बद की सदा हो जैसे
किसी गुम्बद की सदा हो जैसे
रात के पिछले पहर ध्यान तिरा
कोई साए में खड़ा हो जैसे
आम के पेड़ पे कोयल की सदा
तेरा उस्लूब-ए-वफ़ा हो जैसे
यूँ भड़क उट्ठे हैं शो'ले दिल के
अपने दामन की हवा हो जैसे
रह गए होंट लरज़ कर अपने
तेरी हर बात बजा हो जैसे
दूर तकता रहा मंज़िल की तरफ़
रह-रव-ए-आबला-पा हो जैसे
यूँ मिला आज वो 'राहत' हम से
एक मुद्दत से ख़फ़ा हो जैसे
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जो मय-कदे से भी दामन बचा बचा के चले
तिरी गली से जो गुज़रे तो लड़खड़ा के चले
तिरी गली से जो गुज़रे तो लड़खड़ा के चले
हमें भी क़िस्सा-ए-दार-ओ-रसन से निस्बत है
फ़क़ीह-ए-शहरस कह दो नज़र मिला के चले
कोई तो जाने कि गुज़री है दिल पे क्या जब भी
ख़िज़ाँ के बाग़ में झोंके ख़ुनुक हवा के चले
अब ए'तिराफ़-ए-जफ़ा और किस तरह होगा
कि तेरी बज़्म में क़िस्से मिरी वफ़ा के चले
हज़ार होंट मिले हों तो क्या फ़साना-ए-दिल
सुनाने वाले निगाहों से भी सुना के चले
कहीं सुराग़-ए-चमन मिल ही जाएगा 'राहत'
चलो उधर को जिधर क़ाफ़िले सबा के चले
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