दिल जिन को ढूँढ़ता है न-जाने कहाँ गए
ख़्वाब-ओ-ख़याल से वो ज़माने कहाँ गए
ख़्वाब-ओ-ख़याल से वो ज़माने कहाँ गए
मानूस बाम-ओ-दर से नज़र पूछती रही
उन में बसे वो लोग पुराने कहाँ गए
उस सर
ज़मीं से थी जो मोहब्बत वो क्या हुई
बच्चों के लब पे थे जो तराने कहाँ गए
अपनी ख़ता पे सर को झुकाया है आज क्यूँ
अज़बर जो आप को थे बहाने कहाँ गए
पत्थर समाअ'तों से ज़बाँ गुंग हो गई
हम भी गए तो हाल सुनाने कहाँ गए
बे-महरी-ए-हयात तुझे कुछ ख़बर भी है
देखे गए जो ख़्वाब सुहाने कहाँ गए
बचपन सहेलियाँ वो हमा-वक़्त की हँसी
'अंबर' वो ज़िंदगी के ख़ज़ाने कहाँ गए
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ख़ुशी का लम्हा रेत था सो हाथ से निकल गया
वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया
वो चौदहवीं का चाँद था अँधेरी शब में ढल गया
है वस्फ़ उस के पास ये बदल सके हर एक शय
सो मुझ को भी बदल दिया और आप भी बदल गया
मचल रहा था दिल बहुत सो दिल की बात मान ली
समझ रहा है ना-समझ की दाव उस का चल गया
ये दौड़ भी अजीब सी है फ़ैसला अजीब-तर
की फ़ातेह-ए-हयात वो जो गिर के फिर सँभल गया
समझ लिया अहम नहीं मैं उस के वास्ते मगर
नज़र फिर उस से मिल गई ये दिल की फिर बहल गया
अजीब मेरा अक्स था उतर के उस की आँख में
सँवारा मुझ को इस तरह की आइना ही जल गया
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ऐ ख़ुदा अजब है तिरा जहाँ मिरा दिल यहाँ पे लगा नहीं
जहाँ कोई अहल-ए-वफ़ा नहीं किसी लब पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं
जहाँ कोई अहल-ए-वफ़ा नहीं किसी लब पे हर्फ़-ए-दुआ नहीं
बड़ा शोर था तिरे शहर का सो गुज़ार आए हैं दिन वहाँ
वो सकूँ कि जिस की तलाश है तिरे शहर में भी मिला नहीं
ये जो हश्र बरपा है हर तरफ़ तो बस इस का है यही इक सबब
है लबों पे नाम-ए-ख़ुदा मगर किसी दिल में ख़ौफ़-ए-ख़ुदा नहीं
जो हँसी है लब पे सजी हुई तो ये सिर्फ़ ज़ब्त का फ़र्क़ है
मिरे दिल में भी वही ज़ख़्म हैं मिरा हाल तुझ से जुदा नहीं
ये जो दश्त-ए-दिल में हैं रौनक़ें ये तिरी अता के तुफ़ैल हैं
दिया ज़ख़्म जो वो हरा रहा जो दिया जला वो बुझा नहीं
ऐ ख़ुदा अजब है तिरी रज़ा कोई भेद इस का न पा सका
कि मिला तो मिल गया बे-तलब जिसे माँगते थे मिला नहीं
वो जो हर्फ़-ए-हक़ था लिखा गया किसी शाम ख़ून से रेत पर
है गवाह मौजा-ए-वक़्त भी कि वो हर्फ़ उस से मिटा नहीं
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तुम्हारा जो सहारा हो गया है
भँवर भी अब किनारा हो गया है
भँवर भी अब किनारा हो गया है
मोहब्बत में भला क्या और होता
मिरा ये दिल तुम्हारा हो गया है
तुम्हारी याद से है वो चराग़ाँ
की आँसू भी सितारा हो गया है
अजब है मौसम-ए-बे-इख़्तियारी
की जब से वो हमारा हो गया
इक अन-जानी ख़ुशी के आसरे में
हमें हर ग़म गवारा हो गया है
हमें कब रास आ सकती थी दुनिया
ग़नीमत है गुज़ारा हो गया है
जिन्हें रहता था ज़ो'म-ए-दिल-फ़रोशी
उन्हें अब के ख़सारा हो गया है
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ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे
हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर
शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे
उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे
यूँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में
ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे
आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा
अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे
इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं
याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे
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ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना
दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना
हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना
इश्क़ ने यूँ दोनों को आमेज़ किया
अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना
ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं
आईने में तुम होते हो तुम भी ना
बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो
अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना
मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो
मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना
माँग रहे हो रुख़्सत और ख़ुद ही अब
हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना
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