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लहू तेज़ाब करना चाहता है
बदन इक आग दरिया चाहता है
बदन इक आग दरिया चाहता है
मुयस्सर से ज़ियादा चाहता है
समुंदर जैसे दरिया चाहता है
इसे भी साँस लेने दे कि हर-दम
बदन बाहर निकलना चाहता है
मुझे बिल्कुल ये अंदाज़ा नहीं था
वो अब रस्ता बदलना चाहता है
नई ज़ंजीर फैलाए है बाँहें
कोई आज़ाद होना चाहता है
रुतें बदलीं नए फल-फूल आए
मगर दिल सब पुराना चाहता है
सुकूँ कहिए जिसे है रास्ते में
दो इक पल ही में आया चाहता है
हवा भी चाहिए और रौशनी भी
हर इक हुज्रा दरीचा चाहता है
बगूलों से भरा है दश्त सारा
यही तो रोज़ सहरा चाहता है
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कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ
दर्द अगर उट्ठे तो क्या शोर मचाने लग जाएँ
दर्द अगर उट्ठे तो क्या शोर मचाने लग जाएँ
भेद ऐसा कि गिरह जिस की तलब करती है उम्र
रम्ज़ ऐसा कि समझने में ज़माने लग जाएँ
आ गया वो तो दिल ओ जान बिछे हैं हर-सू
और नहीं आए तो क्या ख़ाक उड़ाने लग जाएँ
तेरी आँखों की क़सम हम को ये मुमकिन ही नहीं
तू न हो और ये मंज़र भी सुहाने लग जाएँ
वहशतें इतनी बढ़ा दे कि घरौंदे ढा दें
सब्ज़ शाख़ों से परिंदों को उड़ाने लग जाएँ
ऐसा दारू हो रह-ए-इश्क़ से बाज़ आएँ क़दम
ऐसा चारा हो कि बस होश ठिकाने लग जाएँ
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