Akhtar Azad

Top 10 of Akhtar Azad

    तारों की उतरती है डोली और चाँदनी दुल्हन होती है
    जिस रात में दो दिल मिलते हैं वो रात सुहागन होती है

    जब दिल से दिल मिल जाते हैं तो क्या क्या गुल खिल जाते हैं
    कुछ ग़ैर गले लग जाते हैं कुछ अपनों से अन-बन होती है

    जलते हैं जहाँ वाले लो जलें हम राह-ए-वफ़ा में साथ चलें
    दुनिया को छोड़ो दुनिया तो दिल वालों की दुश्मन होती है

    सूरत मिरी आँखों में देखो क्या देख रहे हो आईना
    जिस आँख में कोई बस जाए वो आँख भी दर्पन होती है

    बस उन के लिए ही रात और दिन दिल मेरा धड़कता है लेकिन
    जब सामने वो आ जाते हैं तेज़ और भी धड़कन होती है

    तुम बिन ये बहारों का मौसम लगता है मुझे पतझड़ की तरह
    तुम साथ रहो तो हर इक रुत मेरे लिए सावन होती है

    तस्वीर हो तेरी जब दिल में ग़म दिल के क़रीब आए कैसे
    मैं याद तुझे कर लेता हूँ जब कोई भी उलझन हुई है

    निखरे तो बने इक ताज-महल फैले तो ख़ुश्बू और ग़ज़ल
    लेकिन जो सिमटती है चाहत महबूब का दामन होती है
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    Akhtar Azad
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    यूँ भटकना दर-ब-दर अच्छा नहीं लगता मुझे
    बिन तुम्हारे ये सफ़र अच्छा नहीं लगता मुझे

    प्यार के इस खेल में अंजाम सब का एक है
    टूटना दिल का मगर अच्छा नहीं लगता मुझे

    आसरा अल्लाह का काफ़ी है इंसाँ के लिए
    हाथ फैला कर बशर अच्छा नहीं लगता मुझे

    मैं बुरा हूँ ये भला अपनी अना में मस्त हूँ
    क्यूँ उधर जाऊँ जिधर अच्छा नहीं लगता मुझे

    आने वाली नस्ल के हक़ में दुआएँ कीजिए
    फूल से चेहरों पे डर अच्छा नहीं लगता मुझे

    होती है बच्चों से रौनक़ हर दर-ओ-दीवार की
    बिन परिंदों के शजर अच्छा नहीं लगता मुझे

    जिन घरों में हो नहीं शामिल दुआ माँ-बाप की
    कोई भी घर हो वो घर अच्छा नहीं लगता मुझे
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    Akhtar Azad
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    ये फ़र्श-ओ-अर्श क्या है अल्लाह जानता है
    पर्दों में क्या छुपा है अल्लाह जानता है

    जो भी बुरा-भला है अल्लाह जानता है
    बंदों के दिल में क्या है अल्लाह जानता है

    लाख अपने दिल का सिक्का दुनिया से तू छुपाए
    खोटा है या खरा है अल्लाह जानता है

    जा कर जहाँ से वापस आता नहीं है कोई
    वो बाम कौन सा है अल्लाह जानता है

    ये सुब्ह-ओ-शाम देखो ये धूप-छाँव देखो
    सब क्यूँ ये हो रहा है अल्लाह जानता है

    नेकी-बदी को अपनी कितना ही तू छुपाए
    अल्लाह को पता है अल्लाह जानता है

    क़िस्मत के नाम को सब जाने नहीं हैं 'अख़्तर'
    क़िस्मत में क्या लिखा है अल्लाह जानता है
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    Akhtar Azad
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    हाल-ए-दिल सुनाने में उम्र बीत जाती है
    दिल में घर बनाने में उम्र बीत जाती है

    यूँ तो रोज़ कहते हैं उन को भूल जाएँगे
    हाँ मगर भुलाने में उम्र बीत जाती है

    यूँ तो मुस्कुराने को रोज़ मुस्कुराते हैं
    खुल के मुस्कुराने में उम्र बीत जाती है

    ज़िंदगी हमेशा जब तीरगी की ज़द में हो
    शम्अ''' इक जलाने में उम्र बीत जाती है

    शौक़-ए-जुस्तुजू में हम ला-मकाँ से गुज़रे हैं
    ख़ुद को आज़माने में उम्र बीत जाती है

    इस लिए नहीं करते उन से कोई वा'दा हम
    वा'दे के निभाने में उम्र बीत जाती है

    मौत ज़िंदगी में कुछ फ़ासला नहीं लेकिन
    फिर भी आने जाने में उम्र बीत जाती है

    तिनका तिनका जोड़ा है हम ने रात-दिन 'अख़्तर'
    आशियाँ सजाने में उम्र बीत जाती है
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    Akhtar Azad
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    चलने का हुनर कब आता है जब तक कोई ठोकर खाओ नहीं
    हालात बदलते रहते हैं हालात से तुम घबराओ नहीं

    सपनों के रैन-बसेरे में सदियों से बड़ा सन्नाटा है
    आँखों में नींद सुलगती है अब ख़्वाब कोई दिखलाओ नहीं

    ये बाज़ी प्यार की बाज़ी है यहाँ सब कुछ दाँव पे लगता है
    जीतो तो कभी इतराओ नहीं हारो तो कभी पछताओ नहीं

    बोझल पलकें सूने रस्ते वीरान हवेली सन्नाटा
    अब कोई नहीं आने वाला चौखट पे चराग़ जलाओ नहीं

    ठोकर से कभी ख़ुद अपने ही तलवे ज़ख़्मी हो जाते हैं
    पत्थर तो टूट भी सकते हैं शीशे से मगर टकराओ नहीं

    ख़ुद अपनी तबाही पर हँसना हर शख़्स के बस की बात नहीं
    दीवाना है जो हँस लेता है दीवाने को समझाओ नहीं

    गागर के सागर में अक्सर डूबा है ग़ुरूर पहाड़ों का
    तुम अपने दिल पर रहम करो पनघट पे अकेले जाओ नहीं

    ये रिश्ते-नाते धर्म-कर्म पे पाप-पुण्य हम क्या जानें
    हम ऐसी डगर के जोगी हैं लोगों हम को बहकाओ नहीं

    हमदर्दी कौन जताएगा दुनिया को तो हँसना आता है
    इस टूटे हुए दिल का क़िस्सा दुनिया वालों को सुनाओ नहीं
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    Akhtar Azad
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    आप से दिल लगाना ज़रूरी नहीं
    जान कर चोट खाना ज़रूरी नहीं

    प्यार से देख लो यूँ ही मर जाएँगे
    हर सितम आज़माना ज़रूरी नहीं

    तू ख़ुदा के लिए मेरा दिल तोड़ दे
    रोज़ का ये बहाना ज़रूरी नहीं
    इश्क़ को एक लम्हा बहुत है यहाँ
    रोज़ मिलना मिलाना ज़रूरी नहीं
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    Akhtar Azad
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    हद से गुज़र न जाऊँ मैं ऐसा न कीजिए
    मस्ती-भरी निगाह से देखा न कीजिए

    पलकों को रास्तों में बिछाया न कीजिए
    यूँ अपने इंतिज़ार को रुस्वा न कीजिए

    पढ़ लेंगे लोग चेहरे से दिल की किताब को
    इतना किसी के बारे में सोचा न कीजिए

    ग़ैरों पे ए'तिबार तो है बात दूर की
    अपना भी हो सके तो भरोसा न कीजिए

    मेरी नज़र से आप कहाँ बच के जाएँगे
    मैं आइना हूँ आप का पर्दा न कीजिए

    यूँ मुझ को ए'तिबार बहुत है मगर हुज़ूर
    वादे तो टूट जाते हैं वा'दा न कीजिए

    रिश्ता मिरा ज़मीन से मज़बूत है बहुत
    अब मुझ को आसमाँ से पुकारा न कीजिए

    ख़ुद को जहाँ से आदमी छोटा दिखाई दे
    इतना भी अपने-आप को ऊँचा न कीजिए
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    Akhtar Azad
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    अब हुस्न-ओ-इश्क़ के भी क़िस्से बदल गए हैं
    मंज़िल थी एक लेकिन रस्ते बदल गए हैं

    किस पर यक़ीन कीजे ये दौर मतलबी है
    लगता है ख़ून के भी रिश्ते बदल गए हैं

    आँखें बता रही हैं ज़ाहिर है हाल दिल का
    वो बे-वफ़ा नहीं थे कितने बदल गए हैं

    हम जानते हैं फिर भी पहचानना है मुश्किल
    कुछ दोस्तों के इतने चेहरे बदल गए हैं

    उन को पता था शायद इक दिन लगेगी ठोकर
    अच्छा है वक़्त से वो पहले बदल गए हैं

    जब से मिली है दौलत आदाब भूल बैठे
    अब बात-चीत के भी लहजे बदल गए हैं

    है वक़्त का तक़ाज़ा चुप-चाप घर में रहिए
    चाहत वफ़ा मोहब्बत जज़्बे बदल गए हैं

    मासूमियत कहीं पर गुम हो गई है 'अख़्तर'
    लगता है शहर जा कर बच्चे बदल गए हैं
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    Akhtar Azad
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