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शाख़-ए-बुलंद-ए-बाम से इक दिन उतर के देख
अम्बार-ए-बर्ग-ओ-बार-ए-ख़िज़ाँ में बिखर के देख
अम्बार-ए-बर्ग-ओ-बार-ए-ख़िज़ाँ में बिखर के देख
मिट्टी के सादगी में अलग सा जमाल है
रंगों की निकहतों की क़बा तार कर के देख
इम्काँ की वुसअ'तों के उफ़ुक़ ज़ार खुल गए
पर तोलने लगे हैं परिंदे सहर के देख
ज़ुल्मत की कश्तियों को भँवर है ये रौशनी
दर खुल रहे हैं दानिश-ओ-इल्म-ओ-ख़बर के देख
क्या जाने ग़म की आँच का परतव कहाँ पड़े
अँगड़ाई ले रहे हैं हयूले शरर के देख
संगीन हादसों की हिकायत तवील है
कोह-ए-गिराँ की बात न कर ज़ख़्म सर के देख
अपनी बसारतों को जसारत की आँच दे
मंज़र इसी नज़र से जहान-ए-दिगर के देख
पिंदार-ए-सर-निगूँ का जुनूँ मो'तबर नहीं
बुझते हुए चराग़ की लौ तेज़ कर के देख
'अकबर' निदा-ए-शब को नवा-ए-सहर समझ
लौ दे रहे हैं हौसले अहल-ए-नज़र के देख
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हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था
इन्ही गलियों में कहीं मेरा सनम-ख़ाना था
इन्ही गलियों में कहीं मेरा सनम-ख़ाना था
इसी धरती पे थे आबाद समन-ज़ार मिरे
इसी बस्ती में मिरी रूह का सरमाया था
थी यही आब-ओ-हवा नश्व-ओ-नुमा की ज़ामिन
इसी मिट्टी से मिरे फ़न का ख़मीर उट्ठा था
अब न दीवारों से निस्बत है न बाम-ओ-दर से
क्या इसी घर से कभी मेरा कोई रिश्ता था
ज़ख़्म यादों के सुलगते हैं मिरी आँखों में
ख़्वाब इन आँखों ने क्या जानिए क्या देखा था
मेहरबाँ रात के साए थे मुनव्वर ऐसे
अश्क आँखों में लिए दिल ये सरासीमा था
अजनबी लगते थे सब कूचा ओ बाज़ार 'अकबर'
ग़ौर से देखा तो वो शहर मिरा अपना था
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ये कौन मेरी तिश्नगी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
कि लौ चिराग़-ए-दर्द की बढ़ा बढ़ा के चल दिया
कि लौ चिराग़-ए-दर्द की बढ़ा बढ़ा के चल दिया
ये मेरा दिल ही जानता है कितना संग-दिल है वो
कि मुझ से अपनी दोस्ती बढ़ा बढ़ा के चल दिया
बिछड़ के उस से ज़िंदगी वबाल-ए-जान हो गई
वो दिल में शौक़-ए-ख़ुद-कुशी बढ़ा बढ़ा के चल दिया
करूँ तो अब मैं किस से अपनी वुसअत-ए-नज़र की बात
वो मुझ में हिस्स-ए-आगही बढ़ा बढ़ा के चल दिया
न दीद की उमीद अब न लुत्फ़-ए-नग़्मा-ए-विसाल
कि लय वो साज़-ए-हिज्र की बढ़ा बढ़ा के चल दिया
वो आया 'अकबर' इस अदास आज मेरे सामने
कि इक झलक सी ख़्वाब की दिखा दिखा के चल दिया
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बस इक तसलसुल-ए-तकरार-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी था
विसाल ओ हिज्र का हर मरहला उबूरी था
विसाल ओ हिज्र का हर मरहला उबूरी था
मिरी शिकस्त भी थी मेरी ज़ात से मंसूब
कि मेरी फ़िक्र का हर फ़ैसला शुऊरी था
थी जीती जागती दुनिया मिरी मोहब्बत की
न ख़्वाब का सा वो आलम कि ला-शुऊरी था
तअ'ल्लुक़ात में ऐसा भी एक मोड़ आया
कि क़ुर्बतों पे भी दिल को गुमान-ए-दूरी था
रिवायतों से किनारा-कशी भी लाज़िम थी
और एहतिराम-ए-रिवायात भी ज़रूरी था
मशीनी दौर के आज़ार से हुआ साबित
कि आदमी का मलाल आदमी से दूरी था
खुला है कब कोई जौहर हिजाब में 'अकबर'
गुहर के बाब में तर्क-ए-सदफ़ ज़रूरी था
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सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग
जीते-जी ही मर जाते हैं कैसे कैसे लोग
जीते-जी ही मर जाते हैं कैसे कैसे लोग
छोड़ के माल-ओ-दौलत सारी दुनिया में अपनी
ख़ाली हाथ गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग
बुझे दिलों को रौशन करने सच को ज़िंदा रखने
जान से अपनी गुज़र जाते हैं कैसे कैसे लोग
अक़्ल-ओ-ख़िरद के बल बूते पर सब को हैराँ कर के
काम अनोखे कर जाते हैं कैसे कैसे लोग
हो बे-लौस मोहब्बत जिन की ग़नी हों जिन के दिल
दामन सब के भर जाते हैं ऐसे ऐसे लोग
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