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Mukesh Guniwal "MAhir"

Top 10 of Mukesh Guniwal "MAhir"

Mukesh Guniwal "MAhir"

Top 10 of Mukesh Guniwal "MAhir"

    वो मेरे ज़ख़्म भरना चाहते थे
    जुनूँ के पर कतरना चाहते थे

    हम उन के बिन ही जीते जा रहे हैं
    कि जिन के साथ मरना चाहते थे

    अभी रोटी कमाने में लगे हैं
    जो दुनिया बस में करना चाहते थे

    हँसी की एक चादर ओढ़ ली है
    मिरे कुछ दर्द उभरना चाहते थे

    तुम अब दिल से उतरते जा रहे हो
    कभी दिल में उतरना चाहते थे

    हमें दुनिया के जैसा कर चले हो
    हमीं थे जो सुधरना चाहते थे

    सिसकते उन को भी हम ने सुना है
    जो दिल फौलाद करना चाहते थे

    यही इक लत हमें ले डूबी माहिर
    भला सबका ही करना चाहते थे
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    जब से हुए हैं दूर किसी आदमी से हम
    हम से ख़फ़ा है ज़िन्दगी और ज़िन्दगी से हम

    ये लोग उन के नाम से क्या क्या न कर रहे
    मिल कर कहेंगे राम से माँ जानकी से हम

    अब और इश्क़ की हमें आदत नहीं रही
    जा थक चुके हैं यार तेरी आशिक़ी से हम

    जैसे कि पूछ लेगा कोई इम्तिहान में
    सुनते थे उस की बात यूँ संजीदगी से हम

    अब दिल ठिकाने पर है न ये ज़ेहन ही दुरुस्त
    पगला गए हैं लौट कर उस की गली से हम

    इक रोज़ यूँ हुआ कि सभी शिकवे भूल कर
    फिर आ गए थे दोस्ती में दुश्मनी से हम

    दो नाव पर सवार थे सो डूबना ही था
    पार इक से हो सके न हुए दूसरी से हम

    पंद्रह बरस के बा'द भी बदला तो कुछ नहीं
    उम्मीद क्या ही रक्खें अब इस नौकरी से हम

    छुप छुप के मिल रहा था तू राधा से ख़्वाब में
    चुगली करेंगे कृष्ण तिरी रुक्मिणी से हम

    तू बावफ़ा रहे या रहे हम से बे-वफ़ा
    बढ़कर तो आज भी नहीं तेरी ख़ुशी से हम

    आँगन के जो दरख़्त थे सारे बबूल थे
    ता-उम्र जूझते रहे गुल की कमी से हम

    हर तीर था हमारे ही तरकश का इस लिए
    सब वार सह गए बड़ी शाइस्तगी से हम

    दुख सोच कर बता मकीं पत्थर हैं नींव के
    मंसब ही छोड़ दें न ज़रा सी नमी से हम
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    पर खुले तो उड़ गए नीले गगन में
    और चिड़िया ढूँढ़ती बच्चे चमन में

    तीन टुकड़े उस ने घर के कर दिए पर
    फिर भी घर चलता रहा उस के कहन में

    सर से ले कर पाँव तक छलनी पड़ा हूँ
    घाव पर दिखता नहीं कोई बदन में

    अब मुझे दौलत ज़ियादा चाहिए है
    जेब सिल दी किस ने ये मेरे कफ़न में

    यार कोई तो नया सा दर्द दो तुम
    अब नयापन चाहिए तर्ज़-ए-सुख़न में

    मारना रावण को हर-दम ही सरल है
    जो विभीषण साथ हो लंका दहन में

    छोड़ के माँ की शरण सुख ढूँढ़ते हम
    पाठ में पूजा इबादत आचमन में
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    जूते में कंकर सा कोई कल इक चुभा
    और फिर तू आ गया मेरे ज़ेहन में
    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    मारना रावण को हर दम ही सरल है
    जो विभीषण साथ हो लंका दहन में
    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    अब तो वो बस तुम पर ग़ज़लें कहता है
    पहले से कुछ बेहतर ग़ज़लें कहता है

    पहले वो कुछ काम और काज भी करता था
    अब तो बैठ के दिनभर ग़ज़लें कहता है

    हर रात क्या तुम उस के ख़्वाब में होती हो
    रोज़ सवेरे उठकर ग़ज़लें कहता है
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    अक्सर दोनों चुप रहते हैं माँ और मैं
    सब कहते हैं इक जैसे हैं माँ और मैं

    जिन के अंदर उन की साँसें अटकी हैं
    बाबा के वो दो तोते हैं माँ और मैं

    हम रिश्ते दौलत से आगे रखते थे
    इसीलिए सब से पीछे हैं मैं और माँ

    राज़ी राज़ी बँटवारे से सब ख़ुश हैं
    कोने में चुप-चाप खड़े हैं माँ और मैं

    हम को तो सबका कहना मानना है ना
    घर के सब से छोटे बच्चे हैं माँ और मैं
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    दुनिया रूठी तब जा कर एहसास हुआ
    आईने को दोस्त बनाया जा सकता था
    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    कर्म करूँ और फल का लालच नइँ रक्खूँ
    यार भला ये कैसी बातें करते हो

    अपने दम तो इंसाँ हो जाते हो तुम
    मुझ से ख़ुदा के जैसी बातें करते हो
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    Mukesh Guniwal "MAhir"
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    तुम थी मेरी और तुम्हारा मैं
    थी का मतलब वक़्त से हारा मैं
    Mukesh Guniwal "MAhir"
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Hasan RaqimHasan RaqimJaypratap chauhanJaypratap chauhanRAAHIRAAHIAditya Singh aadiAditya Singh aadiZafar SiddquiZafar SiddquiDeva morya 'Raahi'Deva morya 'Raahi'Manas AnkManas AnkAmaan AliAmaan AliMeem Maroof AshrafMeem Maroof AshrafAltaf IqbalAltaf Iqbal