ये काफ़ी है कि हम इक दूसरे पर मरते हैं 'अशरफ़'
मोहब्बत साथ जीने का तक़ाज़ा तो नहीं करती
वही सब लोग 'अशरफ़' आस्तीं के साँप निकले हैं
जिन्हें शामिल समझते थे तुम अपने ख़ैर-ख़्वाहों में
अब तो वो शख़्स मिरा कुछ भी नहीं लगता है
पर ये लगता है मुझे कुछ तो मगर लगता है