Hasan Raqim

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    तस्वीर इक जला के बुझाता रहा हूँ मैं
    उसके ही पास लौट के जाता रहा हूँ मैं

    ये ना-तमाम ख़्वाब हक़ीक़त हों किस तरह
    हर पल तो अपनी नींद उड़ाता रहा हूँ मैं

    Hasan Raqim
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    परों को खोलने के एक मौक़े की ज़रुरत है
    फिर उड़ने वालों को ये आसमाँ ऊँचा नहीं लगता

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    पहले रूठा यार मनाना होता है
    फिर कोई त्योहार मनाना होता है

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    तुम्हारे बाद ये हालात हैं कि लगता है
    तुम्हारे साथ मुलाक़ात एक गलती थी

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    तमाम हैं बिमारियाँ मगर तुम्हें हुआ है इश्क़
    तो अब तुम्हें ज़रूरत-ए-दुआ ही है दवा नहीं

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    इश्क़ मोहब्बत प्यार वगेहरा ये जो दिल की बातें हैं
    सच पूछो तो सहरा में दरिया मिलने सी बातें हैं

    मैं उसको ये समझाते थक जाता हूँ की जान सुनो
    ख़त लिखना और फूल भेजना कहने वाली बातें हैं

    Hasan Raqim
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    ब-मंज़िल पर हूँ मगर ये मकां मंज़िल नहीं लगता
    सफ़र को भी मिरा अब कोई मुस्तक़बिल नहीं लगता

    Hasan Raqim
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    इक दफा वो थे मिले तो बात कुछ उनसे हुई
    इश्क़ में, वरना हमें हर बार खम्याज़ा हुआ

    Hasan Raqim
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    तुमसे मिले बिना भी तुमको याद किया जा सकता है
    इश्क़ में ख़ुदको इस तरहा बर्बाद किया जा सकता है

    दिल में छुपी हज़ारों बातें तुमसे बोली जा सकतीं हैं
    कैद सभी, जज़्बातों को आज़ाद किया जा सकता है

    इश्क़ अगर न हो मुझसे तो, छोड़ के जा सकते हो तुम
    या इस से बेहतर हल भी ईजाद किया जा सकता है

    Hasan Raqim
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    कुछ कहा और कुछ अनकहा रह गया
    दिल युँही ख़्वाहिशों से भरा रह गया

    उसने जाते हुए ये भी सोचा नहीं
    उसके जाने पे, बाक़ी ही क्या रह गया

    उम्र भर साथ देना था मेरा जिसे
    वो गया और मैं देखता रह गया

    दश्त में जिसको दरिया समझते हो तुम
    पास उसके है जो भी गया, रह गया

    इश्क़ से और उम्मीद होती भी क्या
    इश्क़ में जो फ़ना था फ़ना रह गया

    Hasan Raqim
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