दिल जब उस की अमान से निकला
समझो मैं इम्तिहान से निकला
समझो मैं इम्तिहान से निकला
एक शिकवा था आख़िरश वो भी
शे'र होकर ज़बान से निकला
अपना सारा बचा कुचा नुक़सान
ज़िंदगी की दुकान से निकला
मैं मुसलसल सुकूत सुनता रहा
और लहू मेरे कान से निकला
पहले निकला मैं ख़ुल्द से और फिर
दिल से निकला जहान से निकला
चार-सू घर मैं ढूँढ़ने के लिए
रोज़ रुसवा मकान से निकला
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इश्क़ जिस को सभी समझते हैं
वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
वहम है लज़्ज़त-ए-रसाई का
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