किताबों ने दबाकर के रखें है राज़ सीने में
ज़रा इनको कभी खोलो मज़ा आएगा जीने में
शहर तेरा छोड़कर मैं जा रहा हूँ रोक ले
ग़म हैं लेकिन फिर भी मैं यूँ गा रहा हूँ रोक ले
था बड़ा मुश्किल ये सब कुछ छोड़कर जाना मगर
ख़्वाबों को मैं दफ़्न करके जा रहा हूँ रोक ले
दास्ताँ इक मेरी जिसको पूरा होना था कभी
मैं अधूरा छोड़ उसको जा रहा हूँ रोक ले
मैं पलट सकता हूँ तू आवाज़ तो दे इक दफ़ा
मैं ख़मोशी तेरी अब सुन पा रहा हूँ रोक ले
देखा था इक बार मैंने उसको यूँ हँसते हुए
नग़्मे उसके अब तलक मैं गा रहा हूँ रोक ले
ज़ुदा होकर मिरे से उस की आँखों में भी पानी है
मैं दरिया हूँ नदी है वो तो उसमें भी रवानी है
इस दिल का आख़िरी है बस वो ख़याल हो तुम
हल हो न पाया जो मुझसे वो सवाल हो तुम
जाने के बाद तेरी ख़्वाहिश नहीं है कोई
इस दिल का आख़िरी जो है वो ज़वाल हो तुम
कितना रोया हूँ हर शब मैं बता नहीं सकता
वो मिरा है ये भी अब मैं जता नहीं सकता
तुम्हें जब देखता हूँ होश अपने मैं खो देता हूँ
जुदाई के तसव्वुर से ही तुमसे मैं रो देता हूँ
ख़ुदा तू बस मुझे वो गुल बना जिसको वो भी चूमें
तुझे बदले में जो भी चाहिए ले मैं वो देता हूँ
मुझे तू कर दे उसका पू रा मुतक़ाबिल न दे कोई
रक़ाबत में हमेशा ही मैं सब कुछ बस खो देता हूँ
कहते हैं वो ज़िंदगी में उनके कोई ग़म नहीं हैं
क्या ये कम हैं यारों क़िस्मत में ही उनकी हम नहीं हैं
मुफ़्त में जो मिल गया तो सस्ता मुझको जाना, लेकिन
दाम मेरा पूछ लो लाखों से भी इक कम नहीं हैं
बाद तेरे मैं किसी का भी नही हो पाया दिल से
वरना मेरे चाहने वाले जहाँ में कम नहीं हैं
चाहूँ ग़र तो आज भी मैं तुझको अपना लूँ बना पर
यार इन सब बातों में अब कोई भी तो दम नहीं हैं
सबके पछतावे हैं अपनी ज़िंदगी के इस जहां में
झूठे हैं वो लोग जो कहते हैं कोई ग़म नहीं हैं