वतन की हो रही अब तो तिजारत है
मियाँ सौदा-गरों पर अब खिलाफ़त है
परेशाँ सब हैं ऐसी अब हुकूमत है
उजाले में भी इतनी यार ज़ुल्मत है
समझते ही नहीं नादान देखो तो
कि फैलाई सियासत ने ही नफ़रत है
हमारे पास बस ये ही है ले लो तुम
मुहब्बत है मुहब्बत है मुहब्बत है
मैं सच तो बोल दूँ पर मसअला ये है
कि मेरी जान को आनी मुसीबत है
ज़माना घूम आ जाते हो हम पर ही
बताओ हम से क्या तुम को अदावत है
सदाएँ दे रही है मुल्क की मिट्टी
किसी में बाक़ी क्या अब भी सदाक़त है
चले आओ भला तुम अब तो अहले-हक़
वतन को अब तुम्हारी ही ज़रूरत है
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