किस की आँखों में समाए रहते हो
इश्क़ की दुनिया बसाए रहते हो
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कुछ ग़म-ए-तन्हाई ले डूबी हमें
इश्क़ की गहराई ले डूबी हमें
इश्क़ की गहराई ले डूबी हमें
निकले थे जिस को ही पाने यार तो
उस की एक अँगड़ाई ले डूबी हमें
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मुझ से शिकवा ही कहाँ रक्खा है इस दुनिया ने
बस इसी बात से मैं दिल को तसल्ली देता
बस इसी बात से मैं दिल को तसल्ली देता
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तुम्हें हुनर तो मिला इश्क़ में यूँ धोखे का
हमें ज़माने लगेंगे यक़ीन करने को
हमें ज़माने लगेंगे यक़ीन करने को
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तो कभी ये ज़मीं आसमाँ की तलब
अब कहाँ ख़त्म होती जहाँ की तलब
अब कहाँ ख़त्म होती जहाँ की तलब
बात कह के गुज़ारी यूँ ही रात भर
इश्क़ को भी कहाँ अब गुमाँ की तलब
आँख भी देखे जो और सिर ले झुका
दिल को है ऐसे ही रहनुमा की तलब
यार मुझ को कमी एक है खल रही
ढूँढ़ता दिल तो है दास्ताँ की तलब
वस्ल और हिज्र के कश्मकश में 'नवी'
मुझ को तो एक ऐसे मकाँ की तलब
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एक इश्क़ का भी यूँ सवाब होगा
तब हमारे हिस्से भी जवाब होगा
तब हमारे हिस्से भी जवाब होगा
नज़रें भी ये आख़िर तो चुनेगी किस को
ये भी देखना तो लाजवाब होगा
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बने इस प्यार में गुलफ़ाम क्या कीजे
हुए इस इश्क़ में बदनाम क्या कीजे
हुए इस इश्क़ में बदनाम क्या कीजे
समुंदर से है रिश्ता दूरी साहिल से
ये आँसू का है क़िस्सा आम क्या कीजे
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