मैं हूँ सदियों से भटकता हुआ प्यासा दरिया
    ऐ ख़ुदा कुछ तो समंदर के सिवा दे मुझ को

    Afzal Ali Afzal
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    बादलों में से छनता हुआ नूर देख
    ऐसी रौशन जबीं है मेरे यार की

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    इश्क़ के रंग में ऐ मेरे यार रंग
    आया फिर आज रंगों का तेहवार रंग

    हो गुलाबी या हो लाल पीला हरा
    आ लगा दूं तुझे भी मैं दो चार रंग

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    कल रात मैं बहुत ही अलग सा लगा मुझे
    उसकी नज़र ने यूँ मेरी सूरत खंगाली दोस्त

    Afzal Ali Afzal
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    बैठा हूँ अभी सामने और सोच रहा हूँ
    इज़हार पे मेरे भला क्या मेरा बनेगा

    Afzal Ali Afzal
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    क्या जाने किस ख़ता की सज़ा दी गई हमें
    रिश्ता हमारा दार पे लटका दिया गया

    शादी में सब पसंद का लाया गया मगर
    अपनी पसंद का उसे दूल्हा नहीं मिला

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    कुछ तो करें कि दिल ये कहीं और जा लगे
    कुछ देर के लिए सही आँखों को चैन हो

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    इक और इश्क़ की नहीं फुर्सत मुझे सनम
    और हो भी अब अगर तो मेरा मन नहीं बचा

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    गर अदीबों को अना का रोग लग जाये तो फिर
    गुल मोहब्बत के अदब की शाख़ पर खिलते नहीं

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    रूठ के मुझसे घर के द्वारे बैठी है
    गाल फुला कर प्यारे प्यारे, बैठी है

    अपने कमरे में ख़ामोश खड़े हैं हम
    और तन्हाई बाल सँवारे बैठी है

    छूट रहा है उम्मीदों का  दामन अब
    ना उम्मीदी पांव पसारे बैठी है

    सोचा था बाहर खाने पर जाएंगे
    पर वो मूंग की दाल बघारे बैठी है

    चुप बैठे हैं रेल की खिड़की से लगकर
    और उदासी साथ हमारे बैठी है

    बैठे हैं चुपचाप अकेले हम इस पार
    इक दुनिया उस पार किनारे बैठी है

    Afzal Ali Afzal
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