मैं हूँ सदियों से भटकता हुआ प्यासा दरिया
ऐ ख़ुदा कुछ तो समंदर के सिवा दे मुझ को
इश्क़ के रंग में ऐ मेरे यार रंग
आया फिर आज रंगों का तेहवार रंग
हो गुलाबी या हो लाल पीला हरा
आ लगा दूं तुझे भी मैं दो चार रंग
क्या जाने किस ख़ता की सज़ा दी गई हमें
रिश्ता हमारा दार पे लटका दिया गया
शादी में सब पसंद का लाया गया मगर
अपनी पसंद का उसे दूल्हा नहीं मिला
गर अदीबों को अना का रोग लग जाये तो फिर
गुल मोहब्बत के अदब की शाख़ पर खिलते नहीं
रूठ के मुझसे घर के द्वारे बैठी है
गाल फुला कर प्यारे प्यारे, बैठी है
अपने कमरे में ख़ामोश खड़े हैं हम
और तन्हाई बाल सँवारे बैठी है
छूट रहा है उम्मीदों का दामन अब
ना उम्मीदी पांव पसारे बैठी है
सोचा था बाहर खाने पर जाएंगे
पर वो मूंग की दाल बघारे बैठी है
चुप बैठे हैं रेल की खिड़की से लगकर
और उदासी साथ हमारे बैठी है
बैठे हैं चुपचाप अकेले हम इस पार
इक दुनिया उस पार किनारे बैठी है