बे-सबब तो न थीं तिरी यादें
तेरी यादों से क्या नहीं सीखा
ज़ब्त का हौसला बढ़ा लेना
आँसुओं को कहीं छुपा लेना
काँपती डोलती सदाओं को
चुप की चादर से ढाँप कर रखना
बे-सबब भी कभी कभी हँसना
जब भी हो बात कोई तल्ख़ी की
मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू बदल देना
बे-सबब तो नहीं तिरी यादें
तेरी यादों से क्या नहीं सीखा
— Wasi Shah















