"जश्न-ए-नौशीन"

घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़
बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़
फ़लक से फ़र्श-ए-ज़मीं पर बरस रहा है नूर
छतों पे खेतों पे शाख़ों पे बस रहा है नूर
चमन है नूर की इक नाव गिर रही है बर्फ़
फ़ज़ा में चारों तरफ़ सुरमई उजाला है
थी बूँद पानी की अब रुई का जो गाला है
दिलों को शौक़ से गर्माओ गिर रही है बर्फ़
है नर्म ऐसी कि फूलों को गुदगुदी आए
सफ़ेद ऐसी कि बगुले का पर भी शरमाए
मिला के गुड़ में इसे खाओ गिर रही है बर्फ़
बनाओ क़ौस-ए-क़ुज़ह बर्फ़ पर गिरा कर रंग
बढ़ाओ बर्फ़ के खेलों से अपने दिल की उमंग
फिसल के बर्फ़ पे दिखलाओ गिर रही है बर्फ़
तराशो बर्फ़ के पुतले मनाओ यख़ की बहार
उछालो बर्फ़ की गेंदें उड़ाओ यख़ की फुवार
चलो कि पार्क में बे-भाव गिर रही है बर्फ़
घरों से बच्चो निकल आओ गिर रही है बर्फ़
बजाओ तालियाँ और गाओ गिर रही है बर्फ़

— Wamiq Jaunpuri

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