आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है

मौज-ए-ग़म उट्ठे कहीं उस का गुहर मेरा है

देख लूँ मैं तो सितारे हैं न देखूँ तो धुआँ
क्या रसा इतना कफ़-ए-दस्त-ए-नज़र मेरा है

समर ओ गुल हैं गुलिस्तान-फ़रोशों के लिए
आबयारी के लिए ख़ून-ए-जिगर मेरा है

क़स्र हो या कि लहद दोनों किरायें के मकाँ
रोज़ कहता है कोई आ के ये घर मेरा है

दश्त की उड़ती हुई रेत पे लिख देते हैं लोग
ये ज़मीं मेरी ये दीवार ये दर मेरा है

इस शर-आबाद ख़राबे में कहाँ हुस्न-ओ-जमाल
हुस्न जितना भी है सब हुस्न-ए-नज़र मेरा है

मौत है जुरअत-ए-इज़हार की पज़मुर्दा-लबी
साज़-ए-तख़लीक़ लब-ए-अर्ज़-ए-हुनर मेरा है

वो ख़ुदा हो तो हो मैं ढूँडने क्यूँ जाऊँ उसे
ख़ुद ही अपना ले मुझे बढ़ के वो गर मेरा है

कट के सर पढ़ते हैं नेज़ों पे भी क़ुरआन 'वहीद'
जुज़्व-ए-तन रह के भी चुप किस लिए सर मेरा है

— Waheed Akhtar

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