तस्वीर

बड़े ही ग़ौर से देखें तिरी तस्वीर हम जैसे
कि शायद ये किसी दिन बात कर के कुछ कहे हम से
कि शायद हँस पड़े ये और फिर देखे नज़र भर के
कहीं तस्वीर से बाहर निकल कर वो
मिरे नज़दीक बैठे और छू कर कुछ असर कर दे
ये पलकों पर छुपे से दफ़्न अश्कों को अमर कर दे
कि बह ले आज फिर सारी हया को छोड़ कर
कि बह ले आज फिर नाते सभी से तोड़ कर
वे अपनी गोद में सर रख के मेरा जो
कभी चू
में ज़रा सा गाल मेरा वो
कभी पूछे ज़रा सा हाल मेरा वो
कि कैसे हम ने दिन ये सब गुज़ारे हैं
हमेशा हर घड़ी हर दिन तुझे ही बस पुकारे हैं

मगर तू तो कभी तस्वीर से बाहर न आ पाई
कभी भी तू निकल कर सामने आ ही नहीं पाई
किसी दिन हम तिरी तस्वीर देखें और ये सोचें
कि ये तस्वीर ज़िंदा हो सके कैसे

— Vishesh asthana

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