इज़्तेराब

जहाँ मैं इज़्तेराब है?
नहीं नहीं
जहाँ ही इज़्तेराब है
हज़ार हाँ कवाकबो नजूम हाए कहकशाॅं से
अतंमों की कोख तक
मदार दर मदार हर वजूद बे क़रार है
ये मेहरो माहो मुश्तरी से हर इलेक्ट्रान तक
ये झूम झूम घूमने मैं जिस तरह का रक़्स है
मुझे समझ मैं आ गया
जहाँ तेरा अक्स है
वो अक्स जो जगह जगह क़दम क़दम रिदम पे है
जहांन ऐन सुर मैं है जहांन ऐन सैम पे है
जहांन तरन्नुमों की लिस्ट मैं से इंतिखाब है
जो 'तुझ हसीं दिमाग़ के हसीं ला शऊर मैं बना हो
ऐसा ख़्वाब है
जहांन इज़्तेराब है
मुझे समझ मैं आ गया है ये जहांन
खाला, मकान, ज़मान के चंद तार से बना हुआ सितार है
उस से कहो किसी तरह सितार छेड़ती रहे
उस से कहो के थोड़ी दिएर और बोलती रहे

— Sohaib Mugheera Siddiqi

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