"तेरी आँखें किसी भी क़ैफ़ियत में मुब्तला करने को काफ़ी हैं"

तेरी आँखें किसी भी क़ैफ़ियत में मुब्तला करने को काफ़ी हैं
तेरे आँसू किसी भी ग़म में रोए आँसुओं में सब से अफ़जल हैं
तेरे रूख़्सार जिन हाथों पे उतरे हैं
वही दस्त-ए-हसीं सय्याहगाहोे में नए रस्ते दिखाते हैं
तेरे लहज़े में अच्छे दिन निकलते हैं
तेरे होंठों से निकले लफ़्ज़ नज़्में हैं
ये उन नज़्मों से बेहतर है जो मैं ने तंगदस्ती के ज़माने में लिखी थी
तुझे नज़दीक से जो देखते हैं उन की क़िस्मत है
वगरना ख़्वाब हर इक आँख पर नाज़िल नहीं होते
तू बरतर है सितारों और रंगों से भरे गाँवों से बरतर है
अगर तू खंडहरों में जा बसे फिर भी तेरा चेहरा कभी मद्धम नहीं होगा
खंडहर आबाद होंगे पुराने घर नई गलियोॆ से ही आबाद होते हैं

— Shehbaz Gohar

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