"फ़िज़ूल"

पैरों तले जो रौंदा गया मैं हूँ वो शजर
मंज़िल को पा सका न जो ऐसा हूँ मैं सफ़र
सागर हूँ ऐसा बुझ न सकी जिस की तिश्नगी
जिस पे न फ़स्ल उग सके ऐसी हूँ मैं ज़मीं
कोई समझ न पाया जिसे ऐसा हूँ बशर
बसते हीं जो उजड़ गया ऐसा हूँ मैं नगर
बारिश में जल गया कभी ऐसा मकान हूँ
ता उम्र जो खुली नहीं ऐसी दुकान हूँ
मंज़र हूँ ऐसा रास जो आता नहीं कभी
ऐसा हूँ इक बदन‌ जो लुभाता नहीं कभी
ज़ीनत है जिस की लुट चुकी महफ़िल हूँ ऐसी मैं
राहें ही जिस को खा गई मंज़िल हूँ ऐसी मैं
पत्थर हूँ राह का जिसे ठोकर नसीब है
ऐसा नसीब हूँ जिसे कमतर नसीब है
गुलशन हूँ जो उजड़ गया फ़स्ले बहार में
दामन हूँ एक मैला मैं गर्दो ग़ुबार में
आँखों का हो सका न मैं काजल कभी यहाँ
ज़ुल्फ़ों का हो सका न मैं बादल कभी यहाँ
है फ़लसफ़ा अलग मेरा माना ये मैं ने भी
है मतलबी सभी यहाँ जाना‌ ये मैं ने भी
ऐ हम सफ़र तेरे लिए दुनिया तो मैं न था
सागर था सूखा माना प दरिया तो मैं न था
जंगल था इक उजाड़ शजर मुझ
में‌ थोड़े थे
लेकिन सुकूत से भरा सहरा तो मैं न था
मैं मुख़्तसर सी दास्ताँ तुम ने किया तवील
ये दास्ताँ फ़िज़ूल है अब क्योंकि, दोस्त सुन
ख़ैरात में किसी की मोहब्बत फ़िज़ूल है
मिल जाए जो उधार वो उल्फ़त फ़िज़ूल है
दोजख़ अगर है ज़िन्दगी दोजख़ ही फिर सही
बदले में इस के जो मिले जन्नत फ़िज़ूल है
इक ज़िन्दगी ही काफ़ी है सबके लिए यहाँ
फिर इस के बा'द ज़ीस्त की हसरत फ़िज़ूल है

— Aman Kumar Shaw "Haif"

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