" महफ़िल "
क्यूँ न शाइरों की महफ़िल सजाई जाए
अपनी-अपनी दास्ताने-ग़म सुनाई जाए
जो बात हम ने किसी ख़ास से ना कही
क्यूँ न वो इस महफ़िल में बताई जाए
महबूबास मोहब्बत ना जता सके यारों
तो इस महफ़िल में मोहब्बत जताई जाए
पैसे-वैसे तो जैसे-तैसे कमा ही लेंगे हम
क्यूँ न महफ़िल में इज़्ज़त कमाई जाए
हम लोग दर्द से भरी बोतलें हैं भाईयों
सबकी तरफ़ से एक एक पिलाई जाए
— Sahil Verma















