"मेरे बा'द"

जब मैं तेरे पुकारने पे न आऊँ
जब मेरे क़दमों के नक़्श तेरी गलियों से मिट जाएँ
जब तेरी हिचकियाँ भी रुक जाए
लगे की कोई याद नहीं कर रहा
या नहीं आए आवाज़ किसी महफ़िल से
नहीं आए आवाज़ मेरी ,कोई नज़्म पढ़ते हुए
जब कोई मुंतज़िर आँखें नहीं दिखे तुम्हें
या दिखे इक लड़की रोती हुई
जो सिसकियाँ ले कर ,पढ़ रही हो मेरी ग़ज़लें
जब ख़ाली दिखे तुम्हें वो चबूतरा,जहाँ
मैं बैठ कर ग़ज़ल लिखता था
जब वो गली भी सुनसान दिखे,
जहाँ हमारी दास्ताँ का आगाज़ हुआ था,
या दिखे वो मोड़ आवारा,
जहाँ हम मिल कर , बिछड़ गए थे,
जब मेरे नाम पे हर नज़र झुक जाए,
तब पूछना किसी बच्चे से,
और आ जाना
शहर के आख़िरी कब्र पे,
इक गुलाब ले कर,
रखना गुलाब मेरी कब्र पर,
और इक आख़िरी बार आवाज लगाना मुझे,
फिर कहना
अलविदा,
अलविदा मेरे दोस्त,
अलविदा मेरे शाइ'र
और खो जाना शहर के भीड़ में

— Satyam Bhaskar "Bulbul"

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