लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं
रूह भी होती है उस में ये कहाँ सोचते हैं

रूह क्या होती है इस से उन्हें मतलब ही नहीं
वो तो बस तन के तक़ाज़ों का कहा मानते हैं

रूह मर जाते हैं तो ये जिस्म है चलती हुई लाश
इस हक़ीक़त को न समझते हैं न पहचानते हैं

कितनी सदियों से ये वहशत का चलन जारी है
कितनी सदियों से है क़ाएम ये गुनाहों का रिवाज

लोग औरत की हर इक चीख़ को नग़्मा समझे
वो क़बीलों का ज़माना हो कि शहरों का रिवाज

जब्र से नस्ल बढ़े ज़ुल्म से तन मेल करें
ये अमल हम में है बे-इल्म परिंदों में नहीं

हम जो इंसानों की तहज़ीब लिए फिरते हैं
हम सा वहशी कोई जंगल के दरिंदों में नहीं

इक बुझी रूह लुटे जिस्म के ढांचे में लिए
सोचती हूँ मैं कहाँ जा के मुक़द्दर फोड़ूं

मैं न ज़िंदा हूँ कि मरने का सहारा ढूंढ़ूं
और न मुर्दा हूँ कि जीने के ग़मों से छूटूं

कौन बतलाएगा मुझ को किसे जा कर पूछूँ
ज़िंदगी क़हर के सांचों में ढलेगी कब तक

कब तलक आँख न खोलेगा ज़माने का ज़मीर
ज़ुल्म और जब्र की ये रीत चलेगी कब तक

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
जब जी चाहा मसला कुचला जब जी चाहा धुत्कार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
ये वो बे-इज़्ज़त चीज़ है जो बट जाती है इज़्ज़त-दारों में
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

मर्दों के लिए हर ज़ुल्म रवा औरत के लिए रोना भी ख़ता
मर्दों के लिए हर ऐश का हक़ औरत के लिए जीना भी सज़ा
मर्दों के लिए लाखों सेजें, औरत के लिए बस एक चिता
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

जिन सीनों ने इन को दूध दिया उन सीनों को बेवपार किया
जिस कोख में इन का जिस्म ढला उस कोख का कारोबार किया
जिस तन से उगे कोंपल बन कर उस तन को ज़लील-ओ-ख़्वार किया
संसार की हर इक बे-शर्मी ग़ुर्बत की गोद में पलती है
चकलों ही में आ कर रुकती है फ़ाक़ों से जो राह निकलती है
मर्दों की हवस है जो अक्सर औरत के पाप में ढलती है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

औरत संसार की क़िस्मत है फिर भी तक़दीर की हेटी है
अवतार पयम्बर जनती है फिर भी शैतान की बेटी है
ये वो बद-क़िस्मत मां है जो बेटों की सेज पे लेटी है
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया

— Sahir Ludhianvi

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