आदम की पहली आवाज़

इन पत्थरों में अब भी
चमक रही है जिन्हें पहली
बार मैं ने अपनी अपनी ज़मीं
मैं देखा मेरी सर-ज़मीं
उन बर्फ़ाब जिस्मों से आबाद है
जिन जिस्मों में ख़ूब-सूरत
आँखें नई जन्नत की सफ़ीर हैं फ़ीडयास
मैं तुझे
एक नए इंसान का चेहरा
दिखाता हूँ उस चेहरे पर
इंसानियत का ग्रीस है और
अज़्मत-ए-आदम की वो तस्वीर है
जो हमेशा मेरी ज़मीन पर चमकती
रहेगी मैं आदम को
फ़ितरत से अज़ीम समझता हूँ
मेरी रातों में पत्थर चमकते
मैं और मेरे दिन
मरमर की रातों से ज़ियादा रौशन हैं
ये देख ये आदम है जिस पर रौशनी
दाहिने कंधे से नीचे गिर रही है
रौशन-दान का दरवाज़ा बंद न करो
अभी आदम को अपनी ही ज़मीन के लिए इस
रौशनी की ज़रूरत है और मेरी ज़मीन
पर अब भी वो साया मौजूद है जिस
साए में अन-गिनत रातें अन-गिनत
रंग और अन-गिनत चेहरे मौजूद हैं
इन अँधेरे में रफ़ाईल ही नहीं
रोडन और हेनरीमोर भी घूम रहे हैं
अपने अपने मुजस्समों के साथ मगर में
अब एक नए आदम का मुजस्समा बनाऊँगा
जिस आदम के चेहरे पर अपनी ज़मीं की मिट्टी के
साथ अपनी ज़मीन का सूरज भी चमकेगा
काश मैं इस नए सूरज का
मुजस्समा बना सकूँ

— Qamar Jameel

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