कहाँ हो ग़ालिबो, मीरो 'नज़ीरो'

कहाँ हो मेरी ज़ुल्फ़ों के असीरो
मेरी सहबा के पैमानौ, कहाँ हो
कहाँ हो मेरे दीवानो कहाँ हो
कहाँ हो आलिमो मसनद-नशीनो
मिरे ख़्वान-ए-अता के रेज़ा-चीनो!
सिला कुछ तो वफ़ा का दो कहाँ हो
कहाँ हो मेरे शहज़ादो कहाँ हो
कहाँ हो ऐ मिरे दर के गदाओ
कम-अज़-कम अपनी सूरत तो दिखाओ
कि में लाचार हो कर रह गई हूँ
बहुत बीमार हो कर रह गई हूँ
कहाँ हो ऐ क़लम-कारो, जियालो?
मुझे कुर्सी-नशीनों से बचा लो
ये मुझ से दूर होते जा रहे हैं
बहुत मग़रूर होते जा रहे हैं
मिरी रोटी पे होता है गुज़ारा
मगर छोड़ा है मुझ को बे-सहारा
सिला अपनी वफ़ा का पा चुकी हूँ
में उन के घर से राँदी जा चुकी हूँ
हक़ीक़त है कि में उस की अमीं हूँ
ये घर मेरा है लेकिन मैं नहीं हूँ
मिरे ही नाम से ओहदा मिला है
मिरे सदक़े में इन का तनतना है
मगर ये मुझ को खाते जा रहे हैं
मिरी हस्ती मिटाते जा रहे हैं
सुहागन थी अभागन हो गई हूँ
में दर दर की भिकारन हो गई हूँ

— Qaisar Siddiqi

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