
नशा ये हुस्न का तेरे मुझे फीका नहीं लगता
शफ़क़ का रंग भी मुझ को तेरे जैसा नहीं लगता
चखी है चाशनी जबसे तेरे इन सुर्ख़ होंठो की
तेरे लब के सिवा कुछ भी मुझे मीठा नहीं लगता
— Poet Mohit Chauhan
Other sher from the same pen
Shers of kamar.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling