"जेब कटने के ब'अद"
मिरे कुर्ते की बूढ़ी जेब से कल
तुम्हारी याद!!
चुपके से निकल कर
सड़क के शोर-ओ-गुल में खो गई है
बड़ी बस्ती है
किस को फ़िक्र इतनी!
कि किस खोली में कब से तीरगी है
यहाँ
हर एक को अपनी पड़ी है
— Nida Fazli
मिरे कुर्ते की बूढ़ी जेब से कल
तुम्हारी याद!!
चुपके से निकल कर
सड़क के शोर-ओ-गुल में खो गई है
बड़ी बस्ती है
किस को फ़िक्र इतनी!
कि किस खोली में कब से तीरगी है
यहाँ
हर एक को अपनी पड़ी है
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