मिल कर सनम से अपने हंगाम दिल कुशाई।
हँसकर कहा ये हम ने ऐ जाँ! बसंत आई।
सुनते ही उस परी ने गुल गुल शगुफ़्ता होकर।
पोशाक ज़र फ़िशानी अपनी वोंही रंगाई।
जब रंग के आई उस की पोशाक पुर नज़ाकत।
सरसों की शाख़ पुर गुल फिर जल्द एक मंगाई।
एक पंखुड़ी उठा कर नाजुक सी उँगलियों में।
रंगत फिर उस की अपनी पोशाक से मिलाई।
— Nazeer Akbarabadi















