"मुहब्बत"
मेरे पास एक पिंजरा है
और उस
में एक परिंदा है
उसे भी प्यार है मुझ से
मुझे भी प्यार है उस से
मेरे पिंजरे का दरवाज़ा
खुला रहता है उस के वास्ते हरदम
न पर कतरे कभी उस के
न पर बाँधे कभी मैं ने
वो उड़ता है
मगर फिर लौट कर पिंजरे में आता है
ज़माने को ये हैरत है
कि ये उड़ क्यूँ नहीं जाता
ज़माने को ये बतलाओ
ज़माने को ये समझाओ
कि मैं ने उस के पैरों में
मुहब्बत बाँध रक्खी है
— Nawaz Deobandi















