"दास्ताँ-ए-मुन्तज़िर"
गर सुननी है तो फिर एक कहानी सुनो
मुन्तज़िर की आँखों में है पानी सुनो
मुन्तज़िर किसी से भी डरता नहीं था
या यूँ कहो कोई उस पे मरता नहीं था
मुन्तज़िर की ता'लीम तो अच्छी रही थी
मगर उस की किस्मत ही कच्ची रही थी
मुन्तज़िर ने दिए जलाए बहुत थे
मुन्तज़िर के ज़ेहन में साए बहुत थे
मगर अब ये आलम अँधेरा अँधेरा
हाए मेरे यारों कब होगा सवेरा
मुन्तज़िर का दर्द मुन्तज़िर का नहीं है
सुना है मुन्तज़िर यहीं हैं कहीं है
गिर गई मुन्तज़िर की हवाई हवेली
मुन्तज़िर की दाढ़ी में हो गई सफेदी
मुन्तज़िर की राह में रोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को काम थोड़े बहुत हैं
मुन्तज़िर को कोई अब फटकारता नहीं है
फटकारता है गर तो दुत्कारता नहीं है
सुना है मुन्तज़िर अब दिखता नहीं है
मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता नहीं है
काश कि मुन्तज़िर बाज़ारों में बिकता
फिर एक दो में नहीं हज़ारों में बिकता
मुन्तज़िर को कोई हज़ारी तो मिलती
फिर चाहें ज़िगर पे आरी ही चलती
मुन्तज़िर की बाँहों में आई तो होती
उस ने भी एक दुनिया पाई तो होती
शाम-ए-मुन्तज़िर को सुबा मिल जाए
गर आप लोगों की दुआ मिल जाए















