
यहाँ अब कौन करता है ज़माने में वफ़ा उल्फ़त
यहाँ उल्फ़त के आड़े जिस्म के व्यापार होते हैं
मुझे बीता हुआ अपना ज़माना याद आता है
कहाँ फिर से वो बचपन के भला इतवार होते हैं
— Puneet Mishra Akshat
Other sher from the same pen
Shers of yaad.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling