हमारी आख़िरी सिगरेट थी ये अरे दुनिया
जो तुझ पे ग़ुस्से में हमने अभी जला ली है
नाला हूँ मैं बेदारी-ए-एहसास के हाथों
दुनिया मिरे अफ़्कार की दुनिया नहीं होती
यूँ दिल को तड़पने का कुछ तो है सबब आख़िर
या दर्द ने करवट ली या तुम ने इधर देखा
कुछ भी नहीं तो पेड़ की तस्वीर ही सही
घर में थोड़ी बहुत तो हरियाली चाहिये
मैं न कहता था हिज्र कुछ भी नहीं
ख़ुद को हलकान कर रही थी तुम
कितने आराम से हैं हम दोनों
देखा बेकार डर रही थी तुम