इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
हल करने से डरता हूँ
सब आसान सवालों को
लहरें देखती रहती हैं
दरिया देखने वालों को
लब-ए-दरिया पे देख आ कर तमाशा आज होली का
भँवर काले के दफ़ बाजे है मौज ऐ यार पानी में
कोई समुन्दर, कोई नदी होती, कोई दरिया होता
हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता?
ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है
नदी का साथ देता हूँ समंदर रूठ जाता है
चाँद चेहरा ज़ुल्फ़ दरिया बात ख़ुशबू दिल चमन
इक तुम्हें दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे
इक मुहब्बत से भरी उस ज़िंदगी के ख़्वाब हैं
पेड़ दरिया और पंछी तेरे मेरे ख़्वाब हैं
मुतअस्सिर हैं यहाँ सब लोग जाने क्या समझते हैं
नहीं जो यार शबनम भी उसे दरिया समझते हैं
हक़ीक़त सारी तेरी मैं बता तो दूँ सर-ए-महफ़िल
मगर ये लोग सारे जो तुझे अच्छा समझते हैं
साथ चलते जा रहे हैं पास आ सकते नहीं
इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं
उसकी भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी मजबूरियाँ
रोज़ मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
सदा लपेट के दिल जाएँगे वगरना नहीं
पहाड़ आह से हिल जाएँगे वगरना नहीं
वो आज दरिया से लड़ने की ठान कर गए थे
कहीं किनारे पे मिल जाएँगे वगरना नहीं