"कान्हा तुम्हारी याद में हूँ बे-क़रार मैं"

कान्हा तुम्हारी याद में हूँ बे-क़रार मैं
करती हूँ लम्हा लम्हा फ़क़त इंतिज़ार मैं

कह कर गए थे आओगे तुम जल्द लौट कर
आ कर करोगे ख़त्म ये तन्हाई का सफ़र

क्या गोपियों के साथ में दिल को लगा लिया
क्या रुक्मनी के साथ ने सब कुछ भुला दिया

क्या तुम को मेरी याद भी आती नहीं कभी
फ़ुर्क़त ये मेरी तुम को रुलाती नहीं कभी

इस दिल में चाहतों की तमन्ना लिए हुए
फिरती हूँ वो तुम्हारा दिलासा लिए हुए

बेचैन किस क़दर हूँ तुम्हारे फ़िराक़ में
जलती हो शम्अ' जैसे उमीदों के ताक में

इस अहद के ही बा'दस आशा हो तुम मिरी
जब से कहा था तुम ने कि राधा हो तुम मिरी

तुम को क़सम है मेरी ना इतना रुलाओ तुम
जितना भी जल्द हो सके बस लौट आओ तुम

— Meena Khan

Bechaini Shayari

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