न रूई हो तो अपने अश्कों से बाती बनाएँगेबुझा दीया हमारा तो हवा से लड़ भी जाएँगेबनाई रोज़ चौदह साल रंगोली बस इस ख़ातिरन जाने रामजी वनवास से कब लौट आएंँगे— Krishnakant Kabk