ये तिरी शक्ल है कि चाँद का रौशन चेहरा

ये सितारे
तिरी आँखों से दमकते क्यूँ हैं
ये तिरी शोख़ अदाओं सी
सनकती पुर्वा
जो मिरे सर से दुपट्टे को गिरा देती है
ख़ुश्क बालों को ज़रा और उड़ा देती है
ये तिरी याद के जुगनू हैं
कि शबनम क़तरे
जिस से बे-ख़्वाब निगाहों की
ज़मीं गीली है
कोई आहट न ही दस्तक कि गली सूनी है
गर मुझे
वक़्त के तेवर का पता जो होता
घर की दहलीज़ से बाहर नहीं जाने देती
सारे दरवाज़ों
दरीचों को मुक़फ़्फ़ल रखती
सूनी आँखों में छुपा लेती मैं
काजल की तरह
अपनी बाँहों के हिसारों में मुक़य्यद रखती
मिरे बच्चे
जो मुझे काश ख़बर ये होती
एक दो पल में मिरा शहर है जलने वाला

— Kahkashan Tabassum

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